Tuesday, 12 May 2026

अनन्त श्री संत दरियाव साहेब : सामाजिक समरसता और आंतरिक भक्ति के महान प्रवक्ता

अनन्त श्री संत दरियाव साहेब : सामाजिक समरसता और आंतरिक भक्ति के महान प्रवक्ता

भारतीय संत परंपरा में संत दरिया साहेब का नाम उन महान संतों में लिया जाता है जिन्होंने केवल आध्यात्मिक साधना का ही मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि समाज को समानता, सदाचार और मानवता का संदेश भी दिया। उनका चिंतन केवल धर्म या भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता, जाति-विहीन समाज, आडम्बर-विरोध और मानवीय मूल्यों की स्थापना पर आधारित था।

दरिया साहेब ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहाँ मनुष्य की पहचान उसके कर्म और आचरण से हो, न कि जाति, वर्ण, धर्म या बाहरी भेष से। उनके दरबार में कोई ऊँच-नीच नहीं थी। सभी मनुष्य एक समान माने जाते थे। वे मानते थे कि सच्चा भक्त वही है जो सदाचार, विनम्रता और संतोष के साथ ईश्वर भक्ति करे —

ररंकार मुख ऊचरै पालै सील संतोष।
दरिया जिनको धिन्न है, सदा रहे निर्दोष।।

यहाँ दरिया साहेब स्पष्ट करते हैं कि केवल नाम-जप पर्याप्त नहीं, बल्कि जीवन में शील, संतोष और पवित्र आचरण का होना भी आवश्यक है।

आंतरिक साधना का संदेश

दरिया साहेब के उपास्य “राम” निर्गुण, निराकार और अंतर्यामी परमात्मा हैं। वे बाहरी तीर्थाटन, कर्मकांड और दिखावटी धार्मिकता के विरोधी थे। उनका मानना था कि परमात्मा बाहर नहीं, प्रत्येक जीव के भीतर विराजमान है। इसलिए मन को निर्मल बनाकर भीतर झाँकना ही सच्ची साधना है —

दुनिया भरम भूल बौराई।
आतम राम सकल घट भीतर जाकी सुध न पाई।।

वे कहते हैं कि लोग मथुरा, काशी और द्वारका जैसे तीर्थों में भटकते हैं, लेकिन आत्मा में स्थित परमात्मा को पहचान नहीं पाते। बिना सद्गुरु के सच्ची समझ नहीं आती और मनुष्य भ्रम के सागर में डूबता रहता है।

धर्मों की एकता का संदेश

संत दरिया साहेब ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को भी निरर्थक बताया। उनके अनुसार सत्य एक ही है, केवल नाम और भाषाएँ अलग हैं —

ररा तो रब्ब आप है ममा मोहम्मद जान।
दोय हरफ के मायने सब ही बेद कुरान।।

यह विचार उस समय के समाज में अत्यंत क्रांतिकारी था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेद और कुरान दोनों उसी परम सत्य की ओर संकेत करते हैं। इस प्रकार वे सामाजिक और धार्मिक एकता के सशक्त समर्थक थे।

बाह्याडम्बर का विरोध

दरिया साहेब की साधना-पद्धति अत्यंत सरल और आंतरिक थी। वे मंदिरों, बाहरी पूजा-पाठ और दिखावे की अपेक्षा अंतःकरण की पवित्रता को अधिक महत्व देते थे —

तन देवल बिच आतम पूजा, देव निरंजन और न दूजा।
दीपक ज्ञान पाँच कर बाती, धूप ध्यान खेवों दिनराती।।

उनके अनुसार सच्ची आरती मन के भीतर होती है। ज्ञान दीपक है, ध्यान धूप है और आत्मा ही मंदिर है।

वे भेषधारी साधुओं पर भी तीखा प्रहार करते हैं —

दरिया भेष विचारिये, खैर मैर की छौड़।।

अर्थात केवल भेष बदल लेना साधुता नहीं है; यदि भीतर कपट और लोभ है तो वह केवल आजीविका का साधन बन जाता है।

कर्मयोग और गृहस्थ जीवन की महिमा

दरिया साहेब संसार त्यागकर संन्यास लेने को अनिवार्य नहीं मानते थे। उनके अनुसार गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी परमात्मा की प्राप्ति संभव है —

हाथ काम मुख राम है, हिरदै सांची प्रीति।
जन दरिया गृह साध की याही उत्तम रीति।।

यह संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। व्यक्ति अपने दैनिक कार्य करते हुए भी ईश्वर से जुड़ा रह सकता है।

माया और संग्रह वृत्ति पर नियंत्रण

दरिया साहेब ने धन, माया और शरीर की नश्वरता का वर्णन कर मनुष्य को लोभ से दूर रहने की प्रेरणा दी। उनका उद्देश्य सामाजिक असमानता और संग्रह वृत्ति को नियंत्रित करना था —

माया संग न चालही जावे नर छिटकाय।।

मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। इसलिए धन का अहंकार व्यर्थ है।

मृत्यु का सार्वभौमिक सत्य

उन्होंने राजा-रंक, हिन्दू-मुसलमान सभी को मृत्यु के सामने समान बताया —

तीन लोक चौदह भुवन राव रंक सुलतान।
दरिया बंचे को नहीं सब जंवरे को खान।।

यह संदेश मनुष्य को विनम्रता और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है।

सत्संग और सदाचार का महत्व

दरिया साहेब के अनुसार समाज सुधार का मार्ग व्यक्ति के चरित्र निर्माण से होकर जाता है। उन्होंने सत्संग, सत्य और सद्गुणों की महिमा का वर्णन किया —

दरिया संगत साध की सहजै पलटै बंस।
कीट छांड मुक्ता चुगै, होय काग से हंस।।

अर्थात अच्छी संगति मनुष्य के जीवन को बदल देती है।

नारी के प्रति उदार दृष्टिकोण

संत दरिया साहेब का नारी के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत सम्मानपूर्ण और मानवीय था। उन्होंने नारी को समाज की आधारशिला माना —

नारी जननी जगत की पाल पोष दे पोस।
मूरख राम बिसारि कै ताहि लगावै दौस।।

वे नारी को ममता, त्याग और स्नेह की प्रतिमूर्ति मानते थे। उस समय जब समाज में स्त्रियों को हीन दृष्टि से देखा जाता था, दरिया साहेब का यह विचार अत्यंत प्रगतिशील था।

सारांश

संत दरिया साहेब केवल एक संत या कवि नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना के महान प्रवक्ता थे। उन्होंने जाति, धर्म, बाह्याडम्बर और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता, सदाचार, समानता और आंतरिक भक्ति का मार्ग दिखाया। उनका चिंतन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।

आज के विभाजित और तनावपूर्ण सामाजिक वातावरण में संत दरिया साहेब की वाणी हमें प्रेम, समानता और आत्मचिंतन का संदेश देती है। वास्तव में उनका दर्शन “मानवता ही सच्चा धर्म है” की भावना को साकार करता है।


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