Tuesday, 12 May 2026

अनन्त श्री संत दरियाव साहेब : सामाजिक समरसता और आंतरिक भक्ति के महान प्रवक्ता

अनन्त श्री संत दरियाव साहेब : सामाजिक समरसता और आंतरिक भक्ति के महान प्रवक्ता

भारतीय संत परंपरा में संत दरिया साहेब का नाम उन महान संतों में लिया जाता है जिन्होंने केवल आध्यात्मिक साधना का ही मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि समाज को समानता, सदाचार और मानवता का संदेश भी दिया। उनका चिंतन केवल धर्म या भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक एकता, जाति-विहीन समाज, आडम्बर-विरोध और मानवीय मूल्यों की स्थापना पर आधारित था।

दरिया साहेब ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहाँ मनुष्य की पहचान उसके कर्म और आचरण से हो, न कि जाति, वर्ण, धर्म या बाहरी भेष से। उनके दरबार में कोई ऊँच-नीच नहीं थी। सभी मनुष्य एक समान माने जाते थे। वे मानते थे कि सच्चा भक्त वही है जो सदाचार, विनम्रता और संतोष के साथ ईश्वर भक्ति करे —

ररंकार मुख ऊचरै पालै सील संतोष।
दरिया जिनको धिन्न है, सदा रहे निर्दोष।।

यहाँ दरिया साहेब स्पष्ट करते हैं कि केवल नाम-जप पर्याप्त नहीं, बल्कि जीवन में शील, संतोष और पवित्र आचरण का होना भी आवश्यक है।

आंतरिक साधना का संदेश

दरिया साहेब के उपास्य “राम” निर्गुण, निराकार और अंतर्यामी परमात्मा हैं। वे बाहरी तीर्थाटन, कर्मकांड और दिखावटी धार्मिकता के विरोधी थे। उनका मानना था कि परमात्मा बाहर नहीं, प्रत्येक जीव के भीतर विराजमान है। इसलिए मन को निर्मल बनाकर भीतर झाँकना ही सच्ची साधना है —

दुनिया भरम भूल बौराई।
आतम राम सकल घट भीतर जाकी सुध न पाई।।

वे कहते हैं कि लोग मथुरा, काशी और द्वारका जैसे तीर्थों में भटकते हैं, लेकिन आत्मा में स्थित परमात्मा को पहचान नहीं पाते। बिना सद्गुरु के सच्ची समझ नहीं आती और मनुष्य भ्रम के सागर में डूबता रहता है।

धर्मों की एकता का संदेश

संत दरिया साहेब ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को भी निरर्थक बताया। उनके अनुसार सत्य एक ही है, केवल नाम और भाषाएँ अलग हैं —

ररा तो रब्ब आप है ममा मोहम्मद जान।
दोय हरफ के मायने सब ही बेद कुरान।।

यह विचार उस समय के समाज में अत्यंत क्रांतिकारी था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेद और कुरान दोनों उसी परम सत्य की ओर संकेत करते हैं। इस प्रकार वे सामाजिक और धार्मिक एकता के सशक्त समर्थक थे।

बाह्याडम्बर का विरोध

दरिया साहेब की साधना-पद्धति अत्यंत सरल और आंतरिक थी। वे मंदिरों, बाहरी पूजा-पाठ और दिखावे की अपेक्षा अंतःकरण की पवित्रता को अधिक महत्व देते थे —

तन देवल बिच आतम पूजा, देव निरंजन और न दूजा।
दीपक ज्ञान पाँच कर बाती, धूप ध्यान खेवों दिनराती।।

उनके अनुसार सच्ची आरती मन के भीतर होती है। ज्ञान दीपक है, ध्यान धूप है और आत्मा ही मंदिर है।

वे भेषधारी साधुओं पर भी तीखा प्रहार करते हैं —

दरिया भेष विचारिये, खैर मैर की छौड़।।

अर्थात केवल भेष बदल लेना साधुता नहीं है; यदि भीतर कपट और लोभ है तो वह केवल आजीविका का साधन बन जाता है।

कर्मयोग और गृहस्थ जीवन की महिमा

दरिया साहेब संसार त्यागकर संन्यास लेने को अनिवार्य नहीं मानते थे। उनके अनुसार गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी परमात्मा की प्राप्ति संभव है —

हाथ काम मुख राम है, हिरदै सांची प्रीति।
जन दरिया गृह साध की याही उत्तम रीति।।

यह संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। व्यक्ति अपने दैनिक कार्य करते हुए भी ईश्वर से जुड़ा रह सकता है।

माया और संग्रह वृत्ति पर नियंत्रण

दरिया साहेब ने धन, माया और शरीर की नश्वरता का वर्णन कर मनुष्य को लोभ से दूर रहने की प्रेरणा दी। उनका उद्देश्य सामाजिक असमानता और संग्रह वृत्ति को नियंत्रित करना था —

माया संग न चालही जावे नर छिटकाय।।

मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। इसलिए धन का अहंकार व्यर्थ है।

मृत्यु का सार्वभौमिक सत्य

उन्होंने राजा-रंक, हिन्दू-मुसलमान सभी को मृत्यु के सामने समान बताया —

तीन लोक चौदह भुवन राव रंक सुलतान।
दरिया बंचे को नहीं सब जंवरे को खान।।

यह संदेश मनुष्य को विनम्रता और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करता है।

सत्संग और सदाचार का महत्व

दरिया साहेब के अनुसार समाज सुधार का मार्ग व्यक्ति के चरित्र निर्माण से होकर जाता है। उन्होंने सत्संग, सत्य और सद्गुणों की महिमा का वर्णन किया —

दरिया संगत साध की सहजै पलटै बंस।
कीट छांड मुक्ता चुगै, होय काग से हंस।।

अर्थात अच्छी संगति मनुष्य के जीवन को बदल देती है।

नारी के प्रति उदार दृष्टिकोण

संत दरिया साहेब का नारी के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत सम्मानपूर्ण और मानवीय था। उन्होंने नारी को समाज की आधारशिला माना —

नारी जननी जगत की पाल पोष दे पोस।
मूरख राम बिसारि कै ताहि लगावै दौस।।

वे नारी को ममता, त्याग और स्नेह की प्रतिमूर्ति मानते थे। उस समय जब समाज में स्त्रियों को हीन दृष्टि से देखा जाता था, दरिया साहेब का यह विचार अत्यंत प्रगतिशील था।

सारांश

संत दरिया साहेब केवल एक संत या कवि नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना के महान प्रवक्ता थे। उन्होंने जाति, धर्म, बाह्याडम्बर और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता, सदाचार, समानता और आंतरिक भक्ति का मार्ग दिखाया। उनका चिंतन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था।

आज के विभाजित और तनावपूर्ण सामाजिक वातावरण में संत दरिया साहेब की वाणी हमें प्रेम, समानता और आत्मचिंतन का संदेश देती है। वास्तव में उनका दर्शन “मानवता ही सच्चा धर्म है” की भावना को साकार करता है।


Tuesday, 25 November 2025

बाड़ी में है नागरी ।। श्री दरियाव वाणी

बाड़ी में है नागरी , पान देशांतर जाय ।

जो वहाँ सूखे बेलड़ी , तो पान यहां बिनसाय ।।

पान बेल से बीछुड़ै , परदेसां रस देत ।

जन दरिया हरिया रहै , उस हरी बेल के हेत।।


 शब्दार्थ

  • नागरी (नागर बेल) → पान की बेल
  • बाड़ी → घर का बगीचा
  • देशांतर जाय → दूर देशों तक पहुँच जाती है
  • सूखे बेलड़ी → यदि बेल सूख जाए
  • बिनसाय → मुरझा जाना, रस खो देना
  • बीछुड़ै → अलग हो जाना, टूट जाना
  • परदेसां → दूर स्थानों में
  • रस देत → रस, स्वाद, जीवन-शक्ति देना
  • हरी बेल → जीवित, सजीव, पोषण देने वाली मूल बेल

भावार्थ

आचार्यश्री बताते हैं कि नागर बेल (पान की बेल) घर की बाड़ी में रहती है, लेकिन उसके पत्तों को कई बार दूर-दूर तक भेजा जाता है।
भले ही पत्ते देशांतर चले जाएँ, फिर भी वे सूखते नहीं, क्योंकि बेल की जीवदर्शनी शक्ति और भावात्मक संबंध उनके भीतर रस बनाए रखता है।

इसी प्रकार, जब साधक सतगुरु की बेल से जुड़ा रहता है — भले वह संसार रूपी परदेस में रह रहा हो — फिर भी गुरु की कृपा और ध्यान उसका मन हराभरा, रसयुक्त और आनंदमय बनाए रखते हैं।


विस्तृत व्याख्या

पहला दोहा :

नागर बेल की उपमा

  • नागर बेल को अत्यंत सावधानी और प्रेम से उगाया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे गुरु अपने शिष्य का पालन-पोषण करते हैं।
  • पान के पत्ते बेल से दूर चले जाएँ, फिर भी उनमें ताजगी रहती है, क्योंकि बेल और पत्ते में भाव-संबंध बना रहता है।
  • लेकिन यदि बेल स्वयं ही सूख जाए, तो कोई भी पत्ता जीवित नहीं रह सकता।

दूसरा दोहा :

“पान बेल से बीछुड़ै, परदेसां रस देत”

  • पान का पत्ता बेल से अलग होकर भी रस देता है, क्योंकि उसकी जड़ में प्राप्त शक्ति उसके भीतर बनी रहती है।
  • उसी तरह शिष्य संसार में रहते हुए भी भक्ति, शांति और प्रेम बाँट सकता है —
    यदि उसका संबंध सतगुरु की हरी बेल (गुरु-कृपा) से अब भी जुड़ा हो।

“जन दरिया हरिया रहै, उस हरी बेल के हेत”

  • संत दरियावजी कहते हैं कि साधक सतगुरु के प्रेम और कृपा के कारण हराभरा रहता है —
    उसका मन नहीं सूखता, भक्ति नहीं टूटती, और जीवन में रस बना रहता है।

👉 जैसे पान की बेल अपने पत्तों का पोषण करती है, वैसे ही सतगुरु अपने शिष्यों को दूर बैठकर भी अपनी कृपा-धारा से सींचते रहते हैं।


टिप्पणी

इन दोनों दोहों में गुरु–शिष्य संबंध को अत्यंत सुंदर प्रतिकों से समझाया गया है 

जब तक शिष्य अपने मन की डोरी गुरु से जोड़े रखता है, तब तक संसार की दूरी, कठिनाई या परिस्थितियाँ उसे सूखा नहीं सकती।
वह भक्ति से, प्रेम से, शांति से भरपूर बना रहता है।


Sunday, 9 November 2025

उन संतन के साथ से ।। श्री दरियाव वाणी


उन संतन के साथ से, जिवड़ा पावै जक्ख ।
दरिया ऐसे साध के, चित चरणों में रक्ख ॥


शब्दार्थ

  • संतन के साथ से → सतगुरु और संतों की संगति से।
  • जिवड़ा → जीव, प्राणी, साधक।
  • पावै जक्ख → विश्राम, ठहराव, आनंद, आत्मिक शांति प्राप्त करता है।
  • साध → संत, महापुरुष, सद्गुरु।
  • चित चरणों में रक्ख → मन और हृदय को संतों के चरणों में स्थिर रखना, श्रद्धा और भक्ति रखना।

 भावार्थ

महाराजश्री कहते हैं कि जब जीव संत-महापुरुषों की संगति करता है, तब उसके भीतर की बेचैनी और दुःख समाप्त हो जाते हैं, और उसे आत्मिक शांति तथा आनंद की अनुभूति होती है।
संत-संग से जीव के भीतर नाम और भक्ति का नशा चढ़ जाता है, जिससे वह सदा आनंदमय हो जाता है।
जो साधक अपने मन को संतों के चरणों में स्थिर रखता है, वह अंततः परम आनंदस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।


 व्याख्या

  • संत-संगति की शक्ति: संतों के संग से मनुष्य का मन निर्मल और शांत होता है। उनकी उपस्थिति से मन में भक्ति और प्रेम की भावना जाग्रत होती है।
  • “जिवड़ा पावै जक्ख” का अर्थ है — आत्मा को गहरी विश्रांति मिलना, जैसे थका हुआ पथिक किसी शीतल छाया में विश्राम पाता है।
  • भक्ति का नशा: जब साधक संतों के निकट रहता है, तो उनकी वाणी, नाम-स्मरण और ध्यान की प्रभावशाली लहरें उसके भीतर प्रवेश करती हैं। इससे संसार का मोह उतर जाता है और परमात्मा के प्रेम का नशा चढ़ जाता है।
  • चित चरणों में रखना: यहाँ “चरण” केवल पैर नहीं, बल्कि संतों के उपदेश, मार्ग और आदर्श का प्रतीक हैं। जो साधक अपने मन को गुरु की वाणी और मर्यादा में स्थिर रखता है, वह कभी भटकता नहीं।
  • ऐसे संतों की संगति से जीव ब्रह्मानंद (आनंदस्वरूप ईश्वर) को प्राप्त करता है और स्वयं भी आनंदमय हो जाता है।

टिप्पणी

यह दोहा हमें यह सिखाता है कि —

  1. संतों की संगति से जीवन में शांति, स्थिरता और दिव्य आनंद का अनुभव होता है।
  2. संसार का सच्चा सुख बाहर नहीं, बल्कि गुरु-संगति में मिलती आत्मिक शांति में है।
  3. जो अपने मन को सद्गुरु के चरणों में टिकाए रखता है, वह संसार के सभी बंधनों से मुक्त होकर आनंदस्वरूप बन जाता है।

🌼 संक्षेप में:
संत-संग वह पवित्र स्थान है जहाँ आत्मा को विश्राम मिलता है, मन को ठहराव, और जीवन को दिशा।
गुरु की संगति ही वह पुल है जो जीव को अज्ञान से उठाकर आनंदस्वरूप ब्रह्म तक पहुँचा देती है।


Friday, 5 September 2025

बिक्ख छुड़ावै चाह कर ।। Sri Dariyav Vani


बिक्ख छुड़ावै चाह कर , अमृत देवै हाथ ।
जन दरिया नित कीजिए, उन संतन का साथ ॥

शब्दार्थ

  • बिक्ख → विष, यहाँ मोह, क्रोध, लोभ, वासनाएँ और अज्ञान।
  • छुड़ावै → छुड़ाते हैं, दूर करते हैं।
  • चाह कर → चाह और वासनाओं से मुक्ति दिलाकर।
  • अमृत → परमात्मा का नाम, शांति और अमरत्व का ज्ञान।
  • देवै हाथ → अपने हाथों से प्रदान करना, सहज उपलब्ध कराना।
  • संतन का साथ → संतों और सतगुरु की संगति।

भावार्थ

आचार्यश्री कहते हैं कि संत महापुरुष और सतगुरु हमारे जीवन से वासनाओं और मोह रूपी विष को निकालकर हमें अमृत रूपी नाम, भक्ति और मुक्ति का ज्ञान देते हैं। वे मनुष्य को नश्वर दुःखों से मुक्त करके अमरत्व और आनंद प्रदान करते हैं। इसलिए ऐसे सतगुरु-संतों का संग निरंतर करना चाहिए।

व्याख्या

  • जीवन में मोह, क्रोध, लोभ और वासनाएँ हमारे लिए विष के समान हैं, जो धीरे-धीरे आत्मा को नष्ट करते हैं।
  • संत और सतगुरु इन विषों को अपनी कृपा और उपदेश से निकालते हैं।
  • वे हमें रामनाम रूपी अमृत का पान कराते हैं, जो आत्मा को अमर, स्वस्थ और आनंदमय बना देता है।
  • "देवै हाथ" यह सूचित करता है कि यह अमृत दूर नहीं, बल्कि सतगुरु की कृपा से सरल और सहज रूप में प्राप्त होता है।
  • आचार्यश्री हमें शिक्षा देते हैं कि ऐसे महापुरुषों का संग करना ही सबसे बड़ा पुण्य और कल्याणकारी कार्य है।

व्यवहारिक टिप्पणी

यह दोहा हमें प्रेरणा देता है कि—

  • संतों और सतगुरुओं की संगति में ही जीवन का सच्चा कल्याण है।
  • यदि हम विष रूपी इच्छाओं और वासनाओं में फँसे रहेंगे, तो जीवन दुखमय होगा।
  • परंतु संतों का संग हमें उस विष से मुक्त कर अमृत प्रदान करता है।
  • इसलिए साधक को चाहिए कि वह नित्य संतों का स्मरण और संग करे, क्योंकि वही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।


Wednesday, 3 September 2025

यह दरिया की वीनती।।श्री दरियाव वाणी


यह दरिया की वीनती , तुम सेती महाराज ।
तुम भृंगी मैं कीट हूँ , मेरी तुमको लाज ॥


 शब्दार्थ

  • वीनती → विनती, प्रार्थना।
  • महाराज → यहाँ सतगुरु के लिए आदरपूर्वक संबोधन।
  • भृंगी → भौंरा (भृंग), जो कीट को अपने स्वरूप में बदल देता है।
  • कीट → साधारण कीड़ा, यहाँ शिष्य का प्रतीक।
  • लाज → जिम्मेदारी, मान और प्रतिष्ठा की रक्षा।

भावार्थ

आचार्यश्री कहते हैं कि हे गुरूदेव! मैं तो अज्ञान और दोषों से भरा हुआ एक साधारण कीट हूँ, और आप भृंग अर्थात् दिव्य गुणों वाले गुरु हैं। जैसे भृंग कीट को अपनी ध्वनि से अपने जैसा बना देता है, वैसे ही आपकी कृपा और आपके दिव्य शब्द से मैं भी आपके समान स्वरूप को प्राप्त कर सकता हूँ। इसलिए आप मुझे अपनी शरण में लेकर परिपूर्ण बना दीजिए।


व्याख्या

  • इस दोहे में शिष्य की पूर्ण विनम्रता और आत्म-समर्पण प्रकट होता है।
  • शिष्य स्वयं को नगण्य मानकर कहता है कि मैं तो एक छोटा-सा कीट हूँ।
  • गुरु की तुलना भृंग (भौंरा) से की गई है, जो अपनी गूंज से कीट को बदल देता है।
  • "मेरी तुमको लाज" का आशय यह है कि शिष्य को अपनी आत्मा के सुधार की चिंता नहीं है, वह इसे गुरु की जिम्मेदारी मानता है।
  • यहाँ गुरु-शिष्य का सम्बन्ध केवल शिक्षा का नहीं बल्कि आत्मिक परिवर्तन का है।
  • शिष्य का विश्वास है कि गुरु के शब्द और कृपा से उसका अज्ञान नष्ट होकर वह भी गुरु-जैसा स्वरूप धारण कर लेगा।

व्यवहारिक टिप्पणी

यह दोहा हमें यह सिखाता है कि—

  • सच्चा शिष्य अपने दोषों और अज्ञान को स्वीकार करता है और उन्हें गुरु के सामने समर्पित कर देता है।
  • गुरु की शरण में जाना और पूरी निष्ठा से उन्हें समर्पित होना ही साधना की असली शुरुआत है।
  • जब शिष्य अपनी "लाज" (अर्थात अपने उद्धार की जिम्मेदारी) गुरु को सौंप देता है, तभी गुरु उस पर कृपा कर उसे दिव्य बना देते हैं।
  • यह शिष्य का आत्मविश्वास और गुरु पर अटूट भरोसा दर्शाता है।


Saturday, 30 August 2025

साध सुधारै शिष्य को।। श्री दरियाव दिव्य वाणी जी


साध सुधारै शिष्य को, दे दे अपना अंग ।
दरिया संगत कीट की, पलटि सो भया भिरंग ॥


शब्दार्थ

  • साध सुधारै शिष्य को → सतगुरु शिष्य को सुधारते हैं, उसका आत्मिक निर्माण करते हैं।
  • दे दे अपना अंग → अपने स्वरूप और गुण शिष्य को प्रदान करते हैं।
  • दरिया → संत दरियावजी।
  • संगत कीट की → कीट-भृंग की संगति का दृष्टांत।
  • भिरंग → भौंरा, जो कीट को अपने समान बना देता है।

भावार्थ

आचार्यश्री बताते हैं कि जैसे भौंरा किसी कीट को अपने पास रखकर निरंतर गुनगुनाता है, और धीरे-धीरे वह कीट भौंरे के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, वैसे ही सतगुरु की संगति और वाणी शिष्य को बदल देती है। सतगुरु अपने अंग अर्थात् स्वरूप, गुण और शक्ति शिष्य को देकर उसे अपने जैसा बना देते हैं।


व्याख्या

  • शिष्य साधारण मनुष्य रूप में गुरु के पास आता है, जिसमें अज्ञान, वासनाएँ और दोष होते हैं।
  • गुरु अपने वचन, ध्यान और कृपा से शिष्य को बार-बार जगाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे भौंरा गुनगुनाता है।
  • धीरे-धीरे शिष्य का मन बदलने लगता है, वह गुरु की धारा में ढलने लगता है।
  • अंततः शिष्य का स्वभाव और स्वरूप गुरु जैसा हो जाता है –
    • अज्ञान नष्ट हो जाता है।
    • विवेक और भक्ति उत्पन्न होती है।
    • आत्मा अपने मूल स्वरूप को पहचानने लगती है।
  • यहाँ "दे दे अपना अंग" का आशय यह है कि सतगुरु शिष्य को अपने जैसी चेतना और ज्ञान से भर देते हैं।
  • कीट-भृंग की उपमा से यह सिद्ध किया गया है कि संगति का प्रभाव जीवन को पूरी तरह बदल सकता है

व्यवहारिक टिप्पणी

यह दोहा हमें यह सिखाता है कि—

  • जैसे संगति का असर होता है, वैसे ही सतगुरु की संगति साधक के जीवन को दिव्य बना देती है।
  • यदि मनुष्य सतगुरु के पास जाकर सच्चे भाव से बैठता है और उनकी वाणी को धारण करता है, तो वह भी धीरे-धीरे गुरु जैसा हो जाता है।
  • गुरु शिष्य को केवल उपदेश ही नहीं देते, बल्कि अपनी आत्मिक शक्ति का संचार भी उसमें करते हैं।
  • यह प्रक्रिया धैर्य और समर्पण से पूरी होती है, जैसे कीट को भौंरा समय देकर बदलता है।


Friday, 29 August 2025

गुरु आये घन गरज कर।। Sri Dariyav Vani


गुरु आये घन गरज कर, करम कड़ी सब खेर ।
भरम बीज सब भूनिया, ऊग न सक्के फेर ॥


 शब्दार्थ

  • गुरु आये → सतगुरु का प्रकट होना।
  • घन गरज कर → बादल की गर्जना समान प्रबल उपदेश देना।
  • करम कड़ी सब खेर → कठोर कर्म-बन्धनों को तोड़ डाला।
  • भरम बीज सब भूनिया → मोह-माया और अज्ञान के बीज जला दिए।
  • ऊग न सक्के फेर → वे बीज फिर कभी अंकुरित नहीं हो सकते।

 भावार्थ

महाराजश्री कहते हैं कि जब सतगुरु अपने प्रखर वचन और कृपा से साधक के हृदय में उतरते हैं, तब वे अज्ञान और कर्मबंधन के बीज को जलाकर नष्ट कर देते हैं। जैसे जला हुआ बीज कभी अंकुरित नहीं हो सकता, वैसे ही गुरु-कृपा से भस्म हुए कर्म दोबारा फल देने में असमर्थ हो जाते हैं।


व्याख्या

  • हमारे जन्म और मृत्यु का चक्र कर्म और वासनाओं के कारण चलता रहता है।
  • जब तक मन में इच्छाएँ और मोह का बीज है, तब तक आत्मा पुनः-पुनः जन्म लेती रहती है।
  • सतगुरु की वाणी "घन गरज" की तरह होती है, जो साधक को भीतर से झकझोर देती है और भरम (भ्रम), मोह और अज्ञान को भस्म कर देती है।
  • इस अवस्था में साधक का जीवन पूर्णत: बदल जाता है—
    • कर्म-बंधन का नाश हो जाता है।
    • मोह-माया की जड़ कट जाती है।
    • आत्मा परमात्मा की ओर अग्रसर होती है।
  • जैसे बीज को भून देने पर उसमें जीवनशक्ति नहीं रहती, वैसे ही गुरु-प्रसाद से कर्म-बीज निष्क्रिय हो जाते हैं और साधक को पुनर्जन्म का भय नहीं रहता।

व्यवहारिक टिप्पणी

यह दोहा हमें प्रेरणा देता है कि—

  • गुरु-कृपा और नाम-स्मरण से अज्ञान और मोह के बीज जल जाते हैं।
  • जब साधक का लक्ष्य केवल परमात्मा-प्राप्ति रह जाता है, तब संसारिक इच्छाएँ और वासनाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
  • यही अवस्था मुक्ति (मोक्ष) की ओर पहला कदम है।

जैसे जला हुआ बीज फिर अंकुरित नहीं होता, वैसे ही सतगुरु की कृपा से जला हुआ कर्म-संचय हमें दोबारा संसार में बाँध नहीं सकता।