Sunday, 27 July 2014
Wednesday, 16 July 2014
पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री दरियाव जी महाराज की दिव्ये वाणी
दरिया सांचा राम है,और सकल ही जूठ।
सनमुख रहिये राम से,दे सब ही को पुठ।।
राम नाम निस दिन रटे,दूजा नही दाय।
दरिया ऐसे साध की,मै बलिहारी जाय।।
दरिया राम अगाध है,आतम का आधार ।
सुमिरत ही सुख ऊपजे,सहजही मिटे विकार।।
दरिया काया कारवी,मोसर है दिन चार ।
जब लग साँस शरीर में,तब लग राम संभार ।।
दरिया सुन्न समाध की,महिमा घनी अनन्त।
पहुंचा सोई जानसी,कोई कोई बिरला सन्त।।
दरिया नाके नाम के,बिरला आवै कोय।
जो आवे तो परम पद,आवागमन न होय।।
दरिया सुमिरै राम को,दूजी आस निवार।
एक आस लागा रहै,तो कदे न आवे हार।।
दरिया सुमिरै राम को,आठ पहर आराध।
रसना में रस ऊपजे,मिसरी जैसा स्वाद।।
दरिया नर तन पाय कर,किया न राम उचार।
बोझ उतारन आइया,सो ले चले सिर भार।।
दरिया मिरतक देख कर,सतगुरु किनी रीझ।
नाम संजीवन मोहि दिया,तीन लोक को बीज।।
दरिया साधू कृपा करे,तो तारे संसार।
तारण हारा राम है,जा में फेर न सार।।
राम नाम सुमिरन दिया,दिया भक्ति हरी भाव।
आठ पहर बिसरो मती,यूं कहे गुरु दरियाव।।
दरिया सोता सकल जग,जागता नाही कोय।
जागे में फिर जागना,जागा कहिए सोय।।
राम गुण गाय ले रे,जब लग सुखी शरीर।
दरिया इन संसार को,पुठ दिया आनन्द।
जो बंध्या जग जाल में,तान्ही के गल फंद।।
राम राम रटते रहो,जब लग घट में प्राण।
कबुहंक दीनदयाल के,भनक पड़ेगी कान।।
डूबत रहा भव सिंधु में,लोभ मोह की धार।
दरिया गुरु तैरु मिला,क्र दिया परले पार।।
दरिया गुरु गरुवा मिला ,कर्म किया सब रद।
झूठा भर्म छुड़ाय कर,पकड़ाया सत शब्द।।
Saturday, 21 June 2014
Saturday, 10 May 2014
दरियाव जी महाराज की दिव्या वाणी
पिये सुधारस प्रेम से,राम नामनिज तंत ।।
दरिया आत्म मल भरा ,कैसे निर्मल होय ।
साबुन लावे प्रेम का,राम नाम जल धोय ।।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु,कर किरपा अपनायो।
खायो न खूटे चोर न लुटे,दिन-दिन बढ़त सवायो।।
मुझ में राम तुजमे राम,हम सब में राम समाया ।
करलो सभी से प्रेम,जगत में कोई नही पराया ।।
तीन लोक को बीज है ,ररो ममो दोई अंक।
दरिया तन मन अर्प के,पिछे होय निसंक ।।
पंडित ज्ञानी बहु मिले,वेद ज्ञान परवीन !
दरिया ऐसा ना मिला,राम नाम लवलीन !!
दरिया दूजे धर्म से,संसय मिटे न सूल!
राम नाम रटता रहे,सब धर्मो का मूल!!
राम राम सब कोई करे,ठग ठाकर और चोर ।
बिना प्रेम रीझे नही,नागर नन्द किशोर ।।
दरिया नरतन पाय कर,किया चाहें काज ।
राव रंक दोनों तरे,जो बैठे नाम जहाज ।।
दरिया सुमिरे एक राम,एक राम सारे सब काम।
मरना है रहना नही,जा में फेर न सार'
जन दरिया भय मानकर,अपना राम संभार"
दरिया धन वे साधवा,रहे राम लौ लाय!
राम नाम बिन जिव को,काल निरंतर खाय!!
मरना है रहना नही,जा में फेर न सार'
जन दरिया भय मानकर,अपना राम संभार"
दरिया सुमिरे एक राम।
एक राम सारे सब काम।।
दरिया प्रेमी आत्मा,राम नाम धन पाया।
निर्धन था धनवंत हुवा,भुला घर आया।।
गुरु बिन ज्ञान न उपजे,गुरु बिन मिले न भेव।
गुरु बिन संशय न मिटे,जै जै जै गुरुदेव।।
दरिया सांचा सुरमा,अरिदल धाले चूर।
राज थरपिया राम का,नगर बसा भरपूर।।
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