Wednesday, 9 September 2015

जाके उर उपजी नहिं भाई

जाके उर उपजी नहिं भाई।
सो क्या जाने पीर पराई॥

ब्यावर जानै पीर की सार।
बाँझ नार क्या लखै बिकार॥

पतिव्रता पति को व्रत जानै।
बिभचारिनि मिल कहा बखानै॥

हीरा पारख जौहरी पावै।
मूरख निरख कै कहा बतावै॥

लागा घाव कराहै सोई।
कोतगहार के दरद न कोई॥

रामनाम मेरा प्रान अधार।
सोई रामरस पीवनहार॥

जन 'दरिया' जनैगा सोई।
(जाके) प्रेम की माल कलेजे पोई॥

साधो ऐसा ज्ञान प्रकासी

साधो ऐसा ज्ञान प्रकासी।
आतम राम जहाँ लगि कहिए, सबै पुरुष की दासी॥

यह सब जोति पुरुष है निर्मल, नहिं तँह काल निवासी।
हंस बंस जो है निरदागा, जाय मिले अविनासी॥

सदा अमर है मरै न कबहीं, नहिं वह सक्ति उपासी।
आवै जाय खपै सो दूजा, सो तन कालै नासी॥

तजै स्वर्ग नर्क कै आसा, या तन बेबिस्वासी।
है छपलोक सभनि तें न्यारा, नहिं तहँ भूख पियासी॥

केता कहै कवि कहै न जानै, वाके रूप न रासी।
वह गुन रहित तो यह गुन कैसे, ढूँढत फिरै उदासी॥

साँचे कहा झूठ जिनि जानहु, साँच कहै दुरि जासी।
कहै 'दरिया' दिल दगा दूरि कर, काटि दिहैं जम फाँसी॥

नाम बिन भाव करम नहिं छूटै

नाम बिन भाव करम नहिं छूटै।
साध संग औ राम भजन बिन, काल निरंतर लूटै॥

मल सेती जो मलको धोवै, सो मल कैसे छूटै॥
प्रेम का साबुन नाम का पानी, दोय मिल ताँता टूटै॥

भेद अभेद भरम का भाँडा, चौडे पड-पड फूटै॥
गुरु मुख सबद गहै उर अंतर, सकल भरम के छूटै॥

राम का ध्यान तूँ धर रे प्रानी, अमृत कर मेंह बूटै॥
जन 'दरियाव अरप दे आपा, जरा मरन तब टूटै॥

साखी / दरिया साहब

दरिया लच्छन साध का, क्या गिरही क्या भेख।
नि:कपटी निरसंक रहि, बाहर भीतर एक॥

कानों सुनी सो झूठ सब, ऑंखों देखी साँच।
दरिया देखे जानिए, यह कंचन यह काँच॥

पारस परसा जानिए, जो पलटै ऍंग-अंग।
अंग-अंग पलटै नहीं, तौ है झूठा संग॥

बड के बड लागै नहीं, बड के लागै बीज।
दरिया नान्हा होयकर, रामनाम गह चीज॥

Monday, 17 August 2015

भजन -अमृत नीका कहै सब कोई, पीये बिना अमर नहीं होई

अमृत नीका कहै सब कोई,
पीये बिना अमर नहीं होई ।।१।।
कोई कहै अमृत बसै पताला,
नाग लोग क्यों ग्रासै काला ।। २ ।।
कोई कहै अमृत समुद्र मांहि
बड़वा अगिन क्यों सोखत तांहि ।। ३ ।।
कोई कहँ अमृत शशि में बासा,
घटे बढे क्यों होई है नाशा । । ४ ।।
कोई कहै अमृत सुरगां मांहि
देव पियें क्यों खिर खिर जांहि। । ५ ।।
सब अमृत बातों की बाता,
अमृत है संतन के साथा ।। ६ ।।
'दरिया' अमृत नाम अनंता,
जा को पी-पी अमर भये संता ।। ७।।

Monday, 10 August 2015

चिंतामणि का अंग श्री दरियाव दिव्य वाणी जी

दरिया चिंतामणि  रतन ,धरयो स्वान पे जाय।
स्वान सूंघ काने भया, टूकां ही की जाय ।।

आचार्य श्री कहते हैं जब यह चिन्तामणि कुत्ते के सामने रखी गयी
तो कुता बेचारा चिन्तामणि के पास आया, उसे सुंघा तथा सूंघकर दूर
हो गया । क्योंकि उसके मन में तो पेट भरने हेतु रोटी प्राप्त करनें की
इच्छा थी है । अत: यदि रोटी का टुकडा मिलता तो उसे कुछ लाभ
ही होता । इस प्रकार से अज्ञानी कुत्ता चिंतामणि के महत्व और कीमत
को नहीं समझ पाया । इसी प्रकार आज महापुरुष चिन्तामणि रूपी
भगवन्नाम के महत्व के विषय में समझाते रहते है तथा जगह जगह
वह चिन्तामणि रत्न बिखेरते रहते है परन्तु कोई जिघासु होता है वही इसे
प्राप्त कर सकता है अन्यथा आज सारा संसार इस चिन्तामणि का
अतिक्रमण कर रहा है । चिंतामणि प्राप्त होने पर भी इसका महत्व नहीं
समझने के कारण से लोग इसका त्याग करते जा रहे है । जब तक
परमात्मा की किमित के विषय में हमें ज्ञान नहीं है तब तक हम परमात्मा
के नाम को स्वीकार नहीं कर रहे है । परन्तु जब कभी सतगुरु की कृपा
से हमे भगवन नाम की जानकारी हो जायेगी । तब हम एक  क्षण
के लिये भी नाम को अपने हदय से निकाल नही पाएंगे ।