Monday, 27 July 2015

भजन

संतो क्या गृहस्थी क्या त्यागी ।
जहाँ देखूं तेहि बाहर भीतर,
घट घट माया लागी ।। टेक ।।

माटी की भीत पवन का थम्बा,
गुण औगुण से छाया ।
पांच तत्त आकार मिलाकर,
सहजां गृह बनाया ।। 1 ।।
मन भयो पिता मनसा भई माई,
दुख सुख दोनों भाई ।
आशा तृष्णा बहिने मिलकर,
गृह की सौंज बनाई ।। 2।।
मोह भयो पुरुष कुबुध भई धरनी,
पांचो लड़का जाया।
प्रकृति अनंत कुटम्बी मिलकर,
कलहल बहुत उपाया ।। 3 ।।
लड़कों के संग लड़की जाई,
ता का नाम अधीरी ।
बन में बैठी घर घर डोले,
स्वारथ संग खपीरी ।। 4 ।।
पाप पुन्न दोउ पास पडोसी,
अनन्त बासना नाती
राग द्वेष का बंधन लागा,
गृह बना उतपाती ।। 5 ।।
कोई गृह मांड गृह में बैठा,
वैरागी बन बासा ।
जन दरिया इक राम भजन बिन,
घट घट में घर बासा।। 6 ।।

Wednesday, 15 July 2015

राम भजन

राम राम बोलो भाई

पारस का अंग श्री दरियाव दिव्य वाणी जी


आचार्यश्री कहते है कि लोहा बाहर से काला होता है तथा भीतर
से भी काला होता है परन्तु पारस से परसने के पश्चात् वह बाहर से भी
पीला हो जाता है तथा भीतर से भी नर्म और निर्मल हो जाता है । इसी
प्रकार कोई मनुष्य कितना ही अपराधी और पापी हो परन्तु यदि वह संतों
का संग करता है तो कभी न कभी उसके जीवन में ऐसे महत्व का दिन
अवश्य आएगा जब उसकी दानव वृति परिवर्तित होकर देव वृति को
प्राप्त हो जाएगी । इस महापुरुषोत्तर वृत्ति को प्राप्त करने के लिए तो
देवता भी लालायित रहते है । तथा स्वभाव को बदलने के लिए
ऋषि-मुनि कईं युगों तक तपस्या करते रहते है तब कहीं स्वभाव बदलता
है । परन्तु महापुरुयों के संग से यह कार्य सहज ही हो जाता है ।इसलिय
पारस की अपेशा सद्गुरु की महिमा अधिक बताई गई है ।

Saturday, 13 June 2015

सतगुरु का अंग

नमो राम परब्रह्मजी,सतगुरु सन्त आधार।
जन दरिया वन्दन करै,पल पल बारम्बार।।
नमो नमो हरी गुरु नमो,नमो नमो सब सन्त।
जन दरिया वन्दन करै,नमो नमो भगवन्त।।
दरिया सतगुरु भेटिया,जा दिन जन्म सनाथ।
श्रवनां सब्द सुनाय के,मस्तक दिना हाथ।।
सतगुरु दाता मुक्ति का,दरिया प्रेम दयाल।
कृपा कर चरनों लिया,मेटा सकल जंजाल।।
अंतर थो बहु जन्म को,सतगुरु भाँग्यो आय।
दरिया पति से रूठनो,अव कर प्रीति बनाय।।
जन दरिया हरि भक्ति की,गुरां बताई बाट।
भुला ऊजड़ जाय था,नरक पड़न के घाट।।
दरिया सतगुरु शब्द सौ,मिट गई खेंचा तान।
भरम अँधेरा मिट गया,परसा पद निरबान।।
दरिया सतगुरु शब्द की,लागी चोट सुठोड।
चंचल सो निस्चल भया,मिट गई मन की दौड़।।
डूबत रहा भव सिंधु में,लोभ मोह की धार।
दरिया गुरु तैरु मिला,कर दिया परले पार।
दरिया गुरु गरुवा मिला,कर्म किया सब रद।
झुटा भर्म छुड़ाय कर,पकड़ाया सत शब्द।।10।।