Saturday 19 September 2015

दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी

दरिया लच्छन साध का, क्या गिरही क्या भेख।
नि:कपटी निरसंक रहि, बाहर भीतर एक॥
कानों सुनी सो झूठ सब, ऑंखों देखी साँच।
दरिया देखे जानिए, यह कंचन यह काँच॥
पारस परसा जानिए, जो पलटै ऍंग-अंग।
अंग-अंग पलटै नहीं, तौ है झूठा संग॥
बड के बड लागै नहीं, बड के लागै बीज।
दरिया नान्हा होयकर, रामनाम गह चीज॥

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