Thursday, 10 September 2015

कहा कहूँ मेरे पिउ की बात

कहा कहूँ मेरे पिउकी बात! जोरे कहूँ सोइ अंग सुहात।
जब मैं रही थी कन्या क्वारी, तब मेरे करम हता सिर भारी॥
जब मेरे पिउसे मनसा दौड़ी, सतगुरु आन सगाई जोड़ी।
तब मैं पिउका मंगल गाया, जब मेरा स्वामी ब्याहन आया॥
हथलेवा दै बैठी संगा, तब मोहिं लीन्हीं बायें अंगा।
जन 'दरिया' कहे, मिट गई दूती, आपा अरपि पीउ सँग सूती॥

Wednesday, 9 September 2015

जाके उर उपजी नहिं भाई

जाके उर उपजी नहिं भाई।
सो क्या जाने पीर पराई॥

ब्यावर जानै पीर की सार।
बाँझ नार क्या लखै बिकार॥

पतिव्रता पति को व्रत जानै।
बिभचारिनि मिल कहा बखानै॥

हीरा पारख जौहरी पावै।
मूरख निरख कै कहा बतावै॥

लागा घाव कराहै सोई।
कोतगहार के दरद न कोई॥

रामनाम मेरा प्रान अधार।
सोई रामरस पीवनहार॥

जन 'दरिया' जनैगा सोई।
(जाके) प्रेम की माल कलेजे पोई॥

साधो ऐसा ज्ञान प्रकासी

साधो ऐसा ज्ञान प्रकासी।
आतम राम जहाँ लगि कहिए, सबै पुरुष की दासी॥

यह सब जोति पुरुष है निर्मल, नहिं तँह काल निवासी।
हंस बंस जो है निरदागा, जाय मिले अविनासी॥

सदा अमर है मरै न कबहीं, नहिं वह सक्ति उपासी।
आवै जाय खपै सो दूजा, सो तन कालै नासी॥

तजै स्वर्ग नर्क कै आसा, या तन बेबिस्वासी।
है छपलोक सभनि तें न्यारा, नहिं तहँ भूख पियासी॥

केता कहै कवि कहै न जानै, वाके रूप न रासी।
वह गुन रहित तो यह गुन कैसे, ढूँढत फिरै उदासी॥

साँचे कहा झूठ जिनि जानहु, साँच कहै दुरि जासी।
कहै 'दरिया' दिल दगा दूरि कर, काटि दिहैं जम फाँसी॥

नाम बिन भाव करम नहिं छूटै

नाम बिन भाव करम नहिं छूटै।
साध संग औ राम भजन बिन, काल निरंतर लूटै॥

मल सेती जो मलको धोवै, सो मल कैसे छूटै॥
प्रेम का साबुन नाम का पानी, दोय मिल ताँता टूटै॥

भेद अभेद भरम का भाँडा, चौडे पड-पड फूटै॥
गुरु मुख सबद गहै उर अंतर, सकल भरम के छूटै॥

राम का ध्यान तूँ धर रे प्रानी, अमृत कर मेंह बूटै॥
जन 'दरियाव अरप दे आपा, जरा मरन तब टूटै॥

साखी / दरिया साहब

दरिया लच्छन साध का, क्या गिरही क्या भेख।
नि:कपटी निरसंक रहि, बाहर भीतर एक॥

कानों सुनी सो झूठ सब, ऑंखों देखी साँच।
दरिया देखे जानिए, यह कंचन यह काँच॥

पारस परसा जानिए, जो पलटै ऍंग-अंग।
अंग-अंग पलटै नहीं, तौ है झूठा संग॥

बड के बड लागै नहीं, बड के लागै बीज।
दरिया नान्हा होयकर, रामनाम गह चीज॥

Monday, 17 August 2015

भजन -अमृत नीका कहै सब कोई, पीये बिना अमर नहीं होई

अमृत नीका कहै सब कोई,
पीये बिना अमर नहीं होई ।।१।।
कोई कहै अमृत बसै पताला,
नाग लोग क्यों ग्रासै काला ।। २ ।।
कोई कहै अमृत समुद्र मांहि
बड़वा अगिन क्यों सोखत तांहि ।। ३ ।।
कोई कहँ अमृत शशि में बासा,
घटे बढे क्यों होई है नाशा । । ४ ।।
कोई कहै अमृत सुरगां मांहि
देव पियें क्यों खिर खिर जांहि। । ५ ।।
सब अमृत बातों की बाता,
अमृत है संतन के साथा ।। ६ ।।
'दरिया' अमृत नाम अनंता,
जा को पी-पी अमर भये संता ।। ७।।