Monday, 12 September 2022
Tuesday, 26 July 2022
गुरूधाम कि महिमा
गुरूधाम कि महिमा
गुरूधाम यह सबसे बड़ा तिर्थ है। यहाकि धरती परम पवित्र एवं पावन होती है। गुरूधाम जानेसे करोडो पापो का क्षय होता है एवं सभी तीर्थो का फल एकसाथ प्राप्त होता है ।यह वो स्थान है जहा परम योगीश्वर, करूणा के सागर, जगतपती, ईश्वरीय अंश, महातपोनीधी, अखिल ब्रह्माण्डनायक, दीनबन्धु ,जगत को सतमार्ग बताने वाले, विश्व कल्यानार्थ अवतार लेने वाले सतगुरू नीवास करते थे।यहा के रोए रोए मे सतगुरू कि आभा मंडीत है। यहाका प्रत्तेक स्थान प्रियतम सतगुरू के यादोसे अलंकृत है। अनेको संतप्त जीवो के शांती का यह केन्द्र बिंदु है। सतगुरू सद्दैव यहा सुक्षम रूप से विहार करते रहते है क्युकि यह अनोको पुर्व आचार्यो कि साधना स्थली रहा है।ऐसे महान तिर्थराज अपने गुरूधाम जाओ तो तनकी आंंखो का नही अपनी मन कि आंखोका प्रयोग करना।मनकि आंखो से अपने प्रेममूर्ति सतगुरू कि झाकिया देखना, उनके साथ बिताए हुए अनमोल क्षन, उनकि दिव्य लिलाए मनको मोह लेने वाली उनकि मधुर मुस्कान उनकि करूणामयी द्रृष्टि पडनेपर प्राप्त होने वाली आत्मिक शान्ति कि अनुभुती करना यह वह शितल जोस्ना है जो प्रत्तेक शिष्य को प्राप्त नहीं होती। सतगुरू के नुरानी रूप का ध्यान करना तब यह अनुभुती होंगी वे कही दुर नही हमारे अत्यन्त नीकट है और हमसे कह रहे हैं- "मोडो घनो आयो तू "
सतगुरू का स्थान सर्वोच्च है उनके जैसे तो वो ही है।गुरूधाम मे किए गये प्रेत्तेक शुभ कर्म अनंत अनंत गुना फल दाई है। यह वह तपोभुभी है जहा बडे बडे सिद्ध महापुरूष अपनी सिध्दता को सिध्द करने आते है, लक्षमि माता कुबेर एवं समस्त देव गण नतमस्तक होते है। ऐसे मेरे गुरूधाम दरियाव धाम, रेण कि महिमा अवर्णनीय है।
*"सारे तिरथ धाम आपके चरणो मे*
*हे गुरूदेव प्रनाम आपके चरनोमे "*
Wednesday, 13 July 2022
पूज्य गुरुदेव श्री हरिनारायण जी महाराज
श्री रेणपीठाधिप: , गरूड़ासन उपविशतयः।
पूज्य गुरहरिनाराणाय, नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*रेण धाम के पीठाधीश्वर,पीठाधिपति, गरूड़ासन पर विराजमान,पूज्य गुरुदेव श्री हरिनारायण जी महाराज के लिए ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
ब्रह्मज्ञान प्रकाशाय, प्रमानन्दयोगिने।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय, नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*ब्रह्मज्ञान का प्रकाश करने वाले परमानन्द योगिस्वरूप पूज्य श्री गुरुदेव हरिनारायण जी महाराज के लिए ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
शिष्य:प्रगर्ति कामाय, लोकहित विद्यायिने।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय:, नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*शिष्यों की प्रगर्ति हेतु चिंतन करने वाले,लोकहित में प्रवृत ,पूज्य श्री गुरुदेव हरिनारायण जी महाराज के लिए ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
सद्विचार बोधाय, मायामद्विनशीने।
पूज्य गुरहरिनाराणाय:, नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*सद्विचारों का बोध देने वाले, मायामद का विनाश करने वाले पूज्य गुरुदेव श्री हरिनारायण जी महाराज के लिए ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
पुण्यदिशानिर्देशाय,परमपितृरूण।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय:, नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*परमपिता स्वरुप, पुण्यकर्मों के लिए दिशा-निर्देश देने वाले,पूज्य श्री गुरुदेव हरिनारायण जी महाराज के लिए ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
श्रोत्रियब्रह्मनिष्ठाय:,दिव्यज्योतिः स्वरूपिणे।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय:, नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*समस्थ श्रुतियों के शब्द ब्रह्म के मर्मज्ञ व तत्व के ज्ञाता,परोक्ष ब्रह्म सक्ष्यातकारी,दिव्यज्योतिः स्वरूप पूज्य गुरुदेव हरिनारायण जी महाराज के लिये ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
करुणाखड्गपातेन, छित्वा पाशाष्टकं शीशों:।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय:,नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*करुणारूपी तलवार के प्रहार से शिष्य के आठो पाशों (संशय,भय,रोग संकोच,निंदा,प्रतिष्ठा, कुलाभिमान,सम्पति,)को काटने वाले पूज्य गुरुदेव श्री हरिनारायण जी महाराज के लिये ह्रदय से मेरा नमन है, सदा नमन है।*
अज्ञानमूलहरणाय, जन्मकर्मनिवारकम।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय:,नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*अज्ञान की जड़ को उखाड़ने वाले, अनेक जन्मों के कर्मो को निवारने वाले पूज्य गुरुदेव हरिनारायण जी महाराज के लिये ह्रदय से मेरा नमन है , सदा नमन है।*
ज्ञानवेराग्यसिध्यर्थमाय, भावातीतंत्रिगुणरहितं।
पूज्य गुरुहरिनाराणाय:,नमो ह्र्दयार्मम नमः सदा।।
*ज्ञान और वैराग्य को सिद्ध करने वाले, भावना से परे,सत्व,रज ओर तम तीनो गुणों से रहित ,पूज्य गुरुदेव श्री हरिनारायण जी महाराज के लिये ह्रदय से मेरा नमन है,सदा नमन है।*
राम जी राम मेरे राम जी
Thursday, 26 May 2022
Monday, 23 May 2022
संत सद्गुरुदेव पूजनीय हैं।
श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुदेव के लिए न बंधन है और न मोक्ष है। अखण्ड ज्ञान से युक्त हैं अतः ब्रह्म हैं। शरीर दृष्टि से गुरुदेव एक मनुष्य दीखते हैं पर मनुष्य नहीं हैं। जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण मनुष्य दीखते थे, पर मनुष्य नहीं वे ब्रह्म थे। सब प्रकार के भेद भावों से रहित थे। उसी प्रकार गुरु साक्षात परं ब्रह्म हैं। जैसे मदिर में अर्चा विग्रह से विराजकर प्रभु दर्शन और सेवा का सुूयोग हमको देते हैं उसी प्रकार गुरुदेव का स्थूल विग्रह कृपा विग्रह है। हमें इसी का दर्शन प्राप्त है। इसी की सेवा और ध्यान संभव है, व्याप्त का नहीं। संत सद्गुरुदेव पूजनीय हैं।
Saturday, 5 February 2022
सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:- (4)
-:सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:- (4)
हम सब अभी जिस लोक में बैठे है उसको मृत्यु लोक कहते है। यहां जिसने जन्म लिया, फिर चाहे उसकी उम्र लाख वर्ष की ही क्यों न हो, उसको जाना ही पड़ेगा। देखो, हम सब कई बार जन्मने मरने के कारण बहुतों के माता, पिता, भाई, बहिन हो चुके है। पिछले जन्म में हमारे अनेक सम्बन्धी थे परन्तु उस सम्बन्ध के समाप्त हो जाने से उनके सुख-दुख से हमारे सुख-दुख पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सुख-दुख स्वार्थ से होते हैं और अब हमारा उन भूतकाल के सम्बन्धियों से कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होता इसलिए उनके सुख-दुख का हमारे सुख-दुख से कोई सम्बन्ध नहीं।
संसार में मनुष्यों का जो एक दूसरे से सम्बन्ध है वह कर्मों के अनुसार है, सो, मनुष्य माता, पिता, पति, भाई बनकर अपना-अपना लेना-देना पूरा कर लेते हैं। अब थोड़ा विचार करके देखो कि इन नकली और नाशवान माता पिता, भाई बहिन के बिछोह में हम कितने दुखी होते हैं जब कि हमारे जन्म-जन्म के पिता, कभी न मरने वाले, नित्य के साथी रामजी के विछोह में तनिक भी दुखी नहीं होते। यदि हम एक बार भी राम के बिलोह में वास्तविक रूप से दुखी हो जाएं तो सदा सर्वदा के लिए जन्म-मरण का दुख मिट जायगा।
सब जीव उस परम पिता की आज्ञा से संसार में कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं और अपनी खोटी-खरी कमाई करके चले जाते हैं। संसार केवल सराय है। थोड़ा विचार करो, कि पति और देवर लड़की के लिये कितने दिन से पति और देवर है ? सगाई हुई जब से। जब वही लड़की पांच सात वर्ष की थी तो ये लोग उसके क्या थे ? कुछ नहीं। बस तो फिर, जो पहले कुछ नहीं थे वे अब भी कुछ नहीं है। बीच में कुछ समय के लिए स्वप्नवत कुछ सम्बन्ध सा हो गया था। वह नाता टूटने पर कोई किसी का नहीं। इसके विपरीत रामजी का नाता अजर-अमर है और सदा एक सा रहने वाला है। जो रामजी से नाता जोड़ लेता है वह भी अजर अमर हो जाता है। भगवान जिस दशा में रखते हैं उसी में खुशी से रहना चाहिए क्योंकि हम उसके कार्य को समझ नहीं सकते। न जाने हमारे लिए वह क्या ठीक समझता है। हमारा काम यह है कि हम, सदा-सोहागिन मीरा की तरह अपने अजर-अमर वर, राम के साथ प्रेम सगाई करके उसी की गोद में जा बैठे।
रामजी सदा ही प्रेम के ग्राहक है। प्रेमी भक्तों का माहेरा भरते है रथ हांकते हैं, पैर धोते हैं, और संसार में कोई काम नहीं जो रामजी अपने भक्त के लिये नहीं करते। बस, जब हमारा ऐसा पिता है तो हम दुखी क्यों होते हैं ? इसलिए कि हम समझते नहीं। रामजी तुम्हारे पास ही है, बस, पकड़ लो उनका हाथ और रो-रो कर जो चाहो मांग लो। परन्तु सावधान, सत्य और अविनाशी वस्तु मांगना नहीं तो नाशवान वस्तु नष्ट होने पर अभी की तरह फिर रोना पड़ेगा। सच्ची और नाशरहित वस्तु तो स्वयं राम ही हैं। कहीं भूल कर भी तुमने दूसरी वस्तु मांग ली तो रामजी तुमको वह वस्तु देकर स्वयं तुम से दूर रह जायेंगे। बड़ा आश्चर्य है कि राम के रहते हम दुखी है। उनसे बातें करो, वे तुम्हारी सब सुनेंगे और मन लगा कर सुनेंगे और सब इन्तेजाम खुद करेंगे। परन्तु कोई सुनाने वाला हो तब तो ? सब लोग जगत को अपना दुख सुनाते फिरते हैं परन्तु जगपति को कोई नहीं सुनाता। जगत तो बेचारा स्वयं दुखी है। जगतपति रामजी को एक बार प्रहलाद की तरह पुकारों, ध्रुव की तरह पुकारो, मीरा की तरह पुकारो, । इनका राम से सम्बन्ध था वही सम्बन्ध राम से हमारा भी है। वह है झक मारकर सुनेगा, नाचेगा, लटके करेगा, परन्तु कोई नचाने वाला हो तब तो। बस, अब समझ रखो कि तुम रामजी की गोद में हो। वह जो कुछ करता है हमारे लिए ठीक करता है। हम उसके काम को समझते नहीं इसलिए दुखी होते हैं। यह भूल हमारी है कि हम उसके काम में खोट निकालते हैं। तुम उसकी गोद में बैठे हो, बल्कि उसके पेट में बैठे हो परन्तु ऐसा न मानने से दुखी हो । मानली तो तुम सुखी बन जाओगे और फिर तुम जगत को भी सुखी बना सकोगे क्योंकि ऐसा करने की शक्ति तुम में आजाएगी। इससे बढ़कर न शान है, न ध्यान है। राम मंत्र भगवान को नचाने का उपाय है। भजन-भरोसा रखो। राम राम
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