Monday, 2 May 2016

सुरातन का अंग श्री दरियाव दिव्य वाणी



श्री दरियावजी महाराज का सूरातन का अंग :-  

इष्टी स्वाँगी बहु मिले, हिरसी मिले अनन्त।
दरिया ऐसा ना मिला, राम रता कोई सन्त ।।
इस संसारमें अपने अपने इष्ठों को, अपने प्रियजनों को चाहने वाले
तथा तरह तरह के स्वांग बनाकर जीवन यापन करने वाले और अकारण
 ही हर्षित-प्रसन्न होने वाले असंख्य लोग मिले है लेकिन मुझें इसी बात
का दुख है कि इतना प्रयास करने पर भी मुझे अभी तक राम भक्त
 ईश्वर भक्त सच्चा साधु नहीं मिला है । वास्तव में उच्चकोटि के 
 साधू सन्त दुर्लभ होते है।

पंडित ज्ञानी बहू मिले ,
वेद ज्ञान परवीन।
 दरिया ऐसा ना मिला ,
राम नाम लवलीन।।

आचार्य श्री दरियाव जी महाराज फरमाते है मुझे अनेक पण्डित और ज्ञानी मिले, वेदो के ज्ञान में पूर्ण अनेक विद्वान् भी मिले, लेकिन मुझे अभी तक अहर्निंश राम नाम में लवलीन
(तल्लीन) रहने वाला कोई भी सच्चा भक्त नही मिला है।


वक्ता श्रोता बहु मिले, करते खेंचा तान ।
दरिया ऐसा ना मिला, जो सन्मुख झेले बान ।।

इस जीवन से मुझे तरह-तरह की व्यर्थ की बाते करने वाले और
सुनने वाले अनेक लोग मिले है । ये सभी अपने अपने इष्ट और अपने
विचारों को श्रेष्ठ बताने का प्रयास, श्रोताओ के सामने करते रहते है 
लेकिन मुझे अभी तक बातों के स्थान पर काम करने वाला सच्चा शुर
नही मिला है । केवल सच्चा शुर ही शत्रु के सम्मुख रहकर उसके बाणों 
 के प्रहार को सहन करता है । वास्तव में ऐसे शूर के समान ही सच्चा
भक्त , भक्ति से आने वाली बाधाओं को सहन करके निरन्तर राम नाम
 जाप भगवत् भक्ति के लक्ष्य की प्राप्त की और अग्रसर होता रहता है।


दरिया बान गुरुदेव का, बेध भरम विकार।
बाहर घाव दिखे नहीं, भीतर भया सिमार।।

महाराज श्री कह रहे कि मेरे गुरुदेव के शब्द रूपी बाण ने ह्रदय
पर अपने प्रभाव से मेरे सब अवगुण दूर कर दिये है बाण का घाव
शरीर के बाहर दिखाई देता है परन्तु मेरे गुरु के शब्द रूपी बाण का जो
भयानक धाव मेरे हदय पर हुआ है, गुरु के शब्दों का जो प्रभाव मेरे 
हृदय पर पड़ा है, वह घाव-वह प्रभाव किसी को दिखाई नही दे रहा है।
वास्तव में गुरु के सत् शब्दों का मेरे हदय पर अपार प्रभाव हुआ है।

दरिया बाण गुरुदेव का,कोई झेले शुर सधिर।
लागत ही व्यापे सही,रोम रोम में पीर।।
जिस प्रकार युद्व में कोई धीरज रखने वाला शुर ही बाण के प्रहार 
को सहन कर सकता है उसी प्रकार सतगुरु के शब्दरूपी बाण के प्रहार
को केवल सच्चा भक्त ही सहन करता है ,सच्चा धीर भक्त ही गुरु के
शब्दों से प्रभावित होता है और उसे अपने रोम रोम में शब्द का प्रभाव
अनुभव होने लगता है । 


।। सोई घाव तन पर लगै, उठ सम्भाले साज ।
। । चोट सहारे सब्द की, सो सूरा सिरताज।।
शूरों में सिरताज कौन है, इसकी बहुत ही सुन्दर शब्दों में व्याख्या 
करते हुए कहते है कि सच्चा शूर शरीर पर घाव होते ही अपने
साजबाज़-अस्त्रशस्त्र सम्भाल लेता है । वास्तव में सच्चा भक्त गुरु के
शब्दों से प्रभावित होकर अपने राम नाम जाप भक्ति के सच्चे लक्ष्ये को
प्राप्त करने में लग जाता है और धीरे धीरे भक्तो का सिरताज बन
जाता है ।


चोट सहे उर सेल की, मुख ज्यों का त्यों नूर ।।
चोट सहारे शब्द की , दरिया सांचा सूर।।

युद्ध में शुर के ह्रदय में बाण की चोट लगने पर भी मुख के तेज
 (चमक) में कोई कमी नहीं आती है ।जो भक्त गुरु के शब्द  से प्रभावित 
 होकर सच्चे मन से भक्ति में लगकर अपना लक्ष्य पूरा कर लेता है , वही भक्त भक्ति के क्षेत्र में सच्चा सुरवीर है।


दरिया प्रेमी आत्मा, आवै सतगुरु संग।
सतगुरु सेती सब्द ले, मिले सब्द के रंग।।



आचार्यश्री दरियाव जी महाराज आत्मा के विषय में कह रहे हैं कि जो राम जी 
महाराज से प्रेम रखवाली आत्मा होती है, वह सद्गुरु का संग करती
 है तथा सतगुरु से शब्द लेकर शब्द के रंग में मिल जाती है।
   जब कोई भक्ति सतगुरु से शब्द लेकर बहुत अधिक अर्थात 7 
   या 8 घंटा ध्यान करता है तो उसका शरीर मृतक की भांति सुन हो जाता 
   है तथा केवल नाड़ियां चलती है । सब्द रंग में इतना रंग जाता है कि 
   उसे अपना शरीर का ध्यान नहीं रहता है । उस समय ध्यान काल 
   में विभिन्न प्रकार की अद्भुत आवाजों को सुनकर साधक भयभीत हो 
   जाता है अब तो मैं मर जाऊंगा । ऐसी स्थिति में सद्गुरु ही उसे धीरज 
   बंधाते हैं की यह तो ध्यान योग से बहुत शुभ लक्षण हैं । इसे कहते 
   हैं शब्द के रंग में रंग जाना। अतः साधक को दृढ़तापूर्वक साधना 
   करते रहना चाहिए तथा जीवन में प्रतिकूल परिस्थिति की ओर ध्यान
    नहीं देते हुए उन परिस्थितियों को अनुकूल मान लेना चाहिए । 
    क्योंकि जो व्यक्ति दृढ़ता रखता है , वही वास्तव में परमात्मा की 
    प्राप्ति कर सकता है।


दरिया सूरा गुरुमुखी, सहै सब्द का घाव ।। 
लागत ही सुध बीसरे, भूले आन सुभाव।।

गुरुमुखी होकर, गुरु के शब्दों से प्रभावित होकर भक्ति में लग
जाने वाला भक्त ही सच्चा शूर हैं । वह गुरु के शब्दों का हदयपर प्रभाव
होते ही अपनी सुध बुध खो देता है और उसके स्वभाव आचरण में
परिवर्तन हो जाता है । भक्ति मे लीन रहना ही उसका स्वभाव बन जाता है ।

भया उजाला गैब का, दौड़े देख पतंग ।
दरिया आपा मेटकर, मिले अगनी के रंग।।

पतंगा, किसी अनजान स्थान से आनेवाले प्रकाश की ओर दौड़ता 
है । यद्यपि उसे प्रकाश के विषय में कोई ज्ञान नहीं रहता, तथापि वह
अपना अस्तित्व मिटाकर अग्नि के रंग में मिल जाता है क्योंकि वह तो 
प्रकाश का प्रेमी होता है।


दरिया प्रेमी आत्मा, राम नाम धन पाया ।
निरधन था धनवन्त हुवा, भूला घर आया ।।

आचार्य श्री कहते है कि प्रेमी आत्मा ने रामनाम रूपी घन प्राप्त 
 कर लिया तथा उस धन का भंडार इतना विशाल था कि साधक निर्धन 
 से धनवान बन गया । पहले वह भूला भटका हुआ जंगलों मे घूम रहा 
था परन्तु अब उसने असली घर को प्राप्त कर लिया है तथा सच्चे धन
का संग्रह करना आरम्भ कर दिया है । सच्चा धन क्या ?
।। मेने राम रत्न धन पायो।।


सूरा खेत बुहारिया, सतगुरु के विश्वास ।
सिर ले सोंपा राम को, नहीं जीवन की आस।।
खेत अर्थात ऱणांगण । लडाई के मैदान को बुहारने का तात्पर्य यह 
है कि शत्रुओं का मुकाबला करके उन्हें धराशायी कर दे तथा मैदान को 
अपने हस्तगत कर ले । इसी प्रकार हमरि इस अंत: करण रूपी मैदान में
भी काम, क्रोध,लोभ,मोह इत्यादि शत्रुओं ने अधिकार कर लिया है ।
यदि हम इन्हें परास्त करना चाहते है तो हमें सतगुरु का विश्वास तो
करना ही होगा।


आपने कभी भगवान को देखा नहीं है तथा न ही भगवान ने कभी
आपको ऐसा निदेश दिया है कि यह मनुष्य शरीर बहुत ही अनमोल है 
तथा तू नामजाप करके इसका उपयोग कर ले । भगवान ने तो कभी
स्वप्न में भी हमें ऐसा नहीं कहा है । ऐसा उपदेश तो हमें केवल सतगुरु 
ही देते है । अत: सतगुरु भगवान से भी बढकर हुए । अत: सतगुरु का
 विश्वास तो मानना ही पडेगा ।


दरिया खेत बुहारिया, चढा दई की गोदं।
कायर काँपै खड़बड़े, सूरा के मन मोद।।

दई अर्थात देहीं अर्थात आत्मा । देह अर्थात शरीर तथा देही अर्थात
शरीर के अंदर निवास करने वाले परमात्मा । महाराज़ श्री कहते है कि मैने
अपनी आत्मा को अर्थात स्वयं को परमात्मा की गोद में सौप दिया है।
यह भक्त की अभिलाषा है । भक्त का यह पक्का निश्चय है कि
है प्रभु ! मैने मेरे जीवन को पूर्णत: आपके चरणों में समर्पित कर दिया
है । अब चाहे जीवन में सुख आए अथवा दु:ख आए इसकी मुझे कोई
चिंता नहीं है । मेरी तो केवल कामना है कि प्रत्येक परिस्थिति में मेरा
मन आपके श्रीचरणों में लगा रहे । आचार्य श्री कहते है कि इस प्रकार
की दृढ़ता केवल शुरवीरों के मन में होती है।



सूर वीर साँची दसा, भीतर साँचा सूत।
पूठ फिरै नहीं मुख मुड़े, राम तना रजपूत।।

युद्ध क्षेत्र में जब शत्रुपक्ष की ओर से गोलियां आती है, तब कायर
तो भयभीत होकर भाग जाते है क्योंकि वे अवरसवादी होते है । परन्तु
जो शुरवीर होते है वे गोलियों के सामने सीना तानकर खड़े हो जाते
है तथा शत्रुओं से लोहा लेकर उनका संहार करते रहते है । इसी प्रकार
यह जीवन भी एक संघर्ष है । यह संसार एक युद्ध क्षेत्र है तथा प्रत्येक
मानव एक सैनिक है । अत: अब आजीवन हमें जूझना है । हमारे जीवन
में जो कठिनाइयाँ तथा चुनौतियों है इनका सामना करते हुए हमें आगे
बढ़ना है । परन्तु इस युद्ध क्षेत्र में काम-क्रोध रूपी शत्रु हमसे संघर्ष कर
रहे है । यहि हम इन शत्रुओं से पराजित हो गए तो हम कायर बन जाएंगे
तथा भगवान के राज्य में हमारा कोई आदर नहीं होगा । अत: यदि प्रभु
का प्यारा बनना है तो सदा ही इन शत्रुओं के साथ संघर्ष करते रहो और
उन्हें परास्त करो । 

साध सूर का एक अंग, मना न भावै झूठ।
साध न छाँडै राम को, रन में फिरे न पूठ।।

आचार्य श्री ने संत का तथा शूरवीर का एक ही स्वभाव बताया
है । शूरवीर कभी रणांगण में पीठ नहीं दिखाता है । वह तो सदा ही
शत्रुओं का संहार करता हुआ आगे बढ़ता रहता है । उसी प्रकार साधु
कभी राम को नहीं छोड़ता है । भगवद भक्त तो सदा ही कर्मो का सामना
करता हुआ बढ़ता रहता है । चाहे उसे अपने जीवन का बलिदान करना
पडे परन्तु वह अपने प्यारे प्रभु को कभी नहीं छोड़ेगा । 

शूरवीर की सभा में, कायर बैठे आय ।
सूरातन आवै नही, कोटि भाँति समूझाय।।

शूरवीर की सभा मैं, जो कोई बैठे सूर।
 सुनत बात सूख ऊपजै, चढै सवाया नूर।।

आचार्य श्री कहने है कि शूरवीरों की सभा में जब कोई कायर
आकर बैठता है तथा जब वह उस सभा में देश रक्षा तथा समाज रक्षा
जैसे किसी बहुत बड़े कार्य विषय की चर्चा सुनता है तब वह कायर
ऐसे बड़े बड़े मृत्युवत कार्यो को देखकर घबरा जाता है । उसे भिन्न भिन्न 
प्रकार से उदाहरण देकर समझाया जाए तो भी वह समझ नहीं पाता है
क्योंकि उसके हदय में कायरता ने घर कर लिया है । उसी प्रकार जो
व्यक्ति भक्ति से पीछे हटते है वे कायर है । वैदिक काल से ही महापुरुष
हमे समझाते आए है । यहि हमने उन महापुरुषों की बात मान ली होती
तो आज यह संसार नहीं होता । सभी भगवत् स्वरूप होकर भगवत्
धाम में विराजित होते । परन्तु आज भी यह संसार विद्यमान है तथा
बढ़ता ही जा रहा है । इसका अर्थ यह है कि हमने उन महापुरुषों की
बात नहीं मानी तथा हमारे जीवन में कायरता का स्थान है । इस प्रकार
से आचार्यश्री कहते है कि सभा के अंदर कितने ही शूरवीर उस कायर
को भांति-भांति से समझाते है परन्तु वह नही समझता है ।
इसके विपरीत्त शूरवीरों की सभा में कोई शूरवीर आकर बैठता है
तो वह शूरवीरता को चर्चा सुनकर बड़ा ही प्रसन्न होता है तथा उसको
सवाया नूर चढता जाता है अर्थात् शक्ति सवाई होती जाती है ।


















Tuesday, 12 April 2016

दरियाव शतक (संत बलरामदास जी कृत)

दरियावजी शतक.              
नमो नमो सन्तदास महाराजा
नमो नमो सन्तन शिरताजा!१!        
नमो नमो भगवंत स्वरूपा             
नमो नमो "प्रेम" सत रूपा !२!         
नमो नमो गुरू राम अनन्ता            
नमो राम दरियाव भनन्ता !३!         
पूरण,किसना नमो सुखरामा            
नानक,हरका नमो गुरूधामा!४!     
नमो "भागवत" नमो भगवंता         
नमो नमो राम अरू सन्ता !५!         
नमो नमो गोपाल गुरू देवा             
नमो नमो सन्तन की सेवा !६!          
नमो नमो गुरू दीन दयाला             
नमो नमो क्षमाराम कृपाला!७!        
दादा गुरू दान्तड़े वासा                  
जिनके उर में राम निवासा !८!          
 प्रेम गुरू बहु भजनानन्दा              
 खींयासर में मनत आनन्दा !९!  
 रेण नगर में भये अवतारी             
दरिया दाता कहत नर नारी!१०!             
            दोहा                            
जीवन चरित्र वर्णन करूँ , सुनो सभी चित लाय!
छन्द बन्ध जानू नहीं,अक्षर दिये मिलाय!!

प्रगट भये कलिकाल में भाई.           
राम नाम की जहाज चलाई!११!     
अब विस्तार करत कोई दासा        
बिना सुत के भये पिता उदासा!१२!                               
नारी एक पडो़स में रहती               
पुत्र नहीं यह ताना देती !१३!               
मनसा मन में दुख अति पाये          
गीगा सहित बहु तीरथ नाये!१४!    
अंत द्वारका धाम को आये            
अष्ट दश मास वहाँ पे बिताये!१५!                                                      
निशा स्वप्न तब राम पुकारे            
सुत एक तेरे घर पे पधारे!१६!      
करे स्नान समुन्दर मांही                 
एक बालक फेनो में दिखाहीं!१७!                              
सतरा सौ तेतीसा जानो                
मास भाद्र पद अष्टमी मानो!१८!     
माता गीगा हर्ष मनावे                   
किन्तु दूध कहाँ से लावे!१९!        
इच्छा पूर्ण करे भगवाना            
द्विज घनश्याम तहाँ को दीना!२०!                                  
अल्प समय अन्न खावण लागा        
भूमण्डल के भाग्य जो जागा!२१!                                  
पिता विप्र से बोलन लागे               
अब सुत तो अन्न प्रासन लागे !२२!                                         
चले जैतारण जब ही विधाता              
साथ सुन्दर जड़िया का भाता !२३!                                        
                   दोहा                                        
 माता गीगा हर्ष करे देख पुत्र का भाल , 
तात मानसा मोद भरे पूच्छे सुत के हाल (२).

अनन्त कोटि गुण युक्ता होई.            
दास विस्तार करे गुरू सोई!२४!    
पंडित एक जैतारण आये               
माता पिता बहुत हर्षाये !२५!          
पुत्र का नाम विचारो पंडित.           
क्लेश को शीघ्र करो तुम खंडित !२६!                                      
नक्षत्र पाठक तब नाम दिरावा          
तेज पुन्ज दरियाव धरावा!२७!       
अब चमत्कार किये जो भारी         
सोचो विचारो सभी नर नारी!२८!                                  
वासुकि देव वहाँ पर आये               
जहाँ दरिया आनन्द से सोये!२९!     
विदुष देख पुरान बतावे                
यह तो बहुत महामति होवे!३०!      
सप्तम वर्ष पिता स्वर्ग सिधारे       
नाना कमीस के घर पर पधारे!३१!                                   
रायण में एक कला दिखाये              
पंडित विद्वत वर वहाँ आये! ३२!    
देख हस्त द्विज खुश अति होवे       
यह तो राजा या फक्कड़ कहावे!३३!                               
स्वरूपानन्द साथ तब लीने            
 वेद वेदांग पढा सब दीने!३४!            
 दिवस एक उपनिषद देखा              
गुरू बिन ग्यान कहाँ से पेखा!३५!                                  
चित चिंता आतुर अति भारी           
गुरू बनाने की मनमें धारी!३६!    
 तब प्रभु कृपानिधान उचारे                 
धैर्य धार मिले गुरू पूरे !३७!               
प्रेम पुरूष कृपा तब कीनी             
भिक्षा हेतु पथ रेण की लीनी!३८!                                  
नभ वाणी फिर से यह बोले         
 प्रेम गुरू कर आतम तोले!३९!       
गीगा घर भिक्षा को आये                    
 दरिया प्रेम चरण लिपटाये!४०!         
प्रेम गुरू में भक्ति भावा                    
जिनके शिष्य भये दरियावा!४१!      
प्रेम गुरू उपदेश सुनावे                 
ऐसो जनम पुन: नहीं आवे!४२!     
            दोहा                                    
 सम्वत तैतीसा जन्म है, उन्हतरे दीक्षा जान! 
कार्तिक शुद एकादशी, प्रेम दिये वरदान (३)
बहुत शीघ्र गुरू ग्यान बताया        
 पुन: आप रमणी को सिधाया!४३!                               
श्रवण कंठ होय हिरदे आया           
 नाभ कंवल से ध्यान लगाया!४४!     
दरिया भजन अब करने लागा           
जानो रेण के भाग्य यह जागा !४५!                                        
अमृत माँ लक्ष्मी तब देवे              
 दरिया इच्छा राम की केवे !४६!        
रमा कहे बड़े गुरू पाये              
दरिया को यह भेद बताये !४७!      
ब्रह्मपुत्र तब दर्शन को आये            
राम राम कह राम सुहाये !४८!        
कह रिषी नारद हर्ष मनावे             
दास दरियाव की महिमा गावे !४९!                                         
वृहग सवारक हैं रखवारे                 
दास दरियाव चरण चित धारे !५०!                                         
नारद जब वैकुण्ठ सिधारे                      
 रामजी मुख से वचन उचारे !५१!          
दास दरियाव है नारद कैसा           
 वारि निर्मल है शीतल जैसा !५२!     
एक बार प्रभु गिरा फरमावे           
धान का भाव बढे दुख पावे!५३! 
 दोहा                                         
दास दरियाव विश्वास कर, दाता सबके राम ! 
 राम राम रटते रहो,  कदे न लो विश्राम (४).
शिष सब ही तब गिरा उचारी             
 कातिक शुद अन्न लेवां भारी!५४!                                  
 दरिया सब के मन की चीनी          
राम भजन की शिक्षा दीनी!५५!     
गर्भवास में रक्षा कीनी                  
तुम अब भी परतीत न जानी!५६!                                                          
 वैश्य अन्न दे दुखित बहु होवे           
संत दरश का मारग जोवे !५७!       
दरिया दया के है कूपारा              
सबके रक्षक सिरजन हारा!५८!       
कुशाली राम अन्न को फेरा           
दे गुरू आग्या वो करते चेरा!५९!   
सन्त सदा उपकार करावे                   
राम राम रट विपत हरावे !६०!        
दो पंसेरी अन्न जो लाया               
कोठी में कुशाली स्वयं डलवाया!६१!                             
चोहतरवां दुकाल सतायो              
तब सन्त वृध्दभान मनायो!६२!      
शिष्य वर्ग में हल चल देखे             
गुरू दरियाव पुन: यह भाखे!६३!      
तुम वृध्दभान घर अपने जावो        
हमरे यहाँ पर भजन करावो!६४!   
यह सुन सलाहगीर चुप बैठे             
कौन आगे अब गुरू से भेठे!६५!      
वर्षा रितु वृध्दभान विराजे                    
मात गीगा आई कोई काजे!६६!      
विद्युत चमकी देखा वृध्दभाना          
बोली मातु यह कौन सयाना!६७!      
मातु वृध्दभाना पुत्र तुम्हारा          
गुरू से कसूर किया बहु भारा!६८!                                   
अन्दर गमन कर माता बोली           
सुत दरिया ये अन मोली !६९!        
सुनो पुत्र वृध्दभान के कष्टा            
वृध्द के वृध्द करो तुम नष्टा!७०!   
          दोहा                                           
सुन माता के वेण आप खुद बाहर सिधाये ,
शिष को धृति बंधाय आप गुरू अगम बुलाये(५)
तब वृध्दभान प्रार्थना करता        
 गुरू चरणों में मस्तक धरता!७१! 
अष्ट सिध्द नव निध्दि के दाता         
 दास क्या जानूं पेट भर खाता!७२!                               
आप दीन दया निधी भारी            
 शिष्य की गुरू करो रखवारी!७३!                           
 मैं दासन का दास तुम्हारा              
चरणों में शिष झुकत हमारा!७४!                                 
यह स्तुति वृध्दभान करी है             
दरिया गुरू सब पीड़ा हरी है! ७५!                                             
एक अचम्भा भया अति सुन्दर.              
मास अष्ट अन्न कोठी अन्दर!७६!                                
दिवस गण अन्न कोठी में नाक्यो      
सो अन्न चले कुशाली भाक्यो!७७!                               
आग्या गुरू तभी फरमाये              
कोठी देख बाहर फिंकवाये!७८!       
कोठी जब बाहर प्रभु डारी            
रिध्दि सिध्दि दोऊँ नमस्करारी!७९!                          
दरिया सिध्दि नागोर को जाओ.        
हरकाराम घर सेव कराओ!८०!      
बलरामा लक्ष्मी चंचल होवे           
 राम भजे नहीं जिन्दे ही मूवे!८१!   
    दोहा                                         
माया ने मोहा जगत,कर लिया अपना दास! 
राम भजन की ओट में, रह गये दरिया दास (६)
एक समय बगतसिंह राजा          
राज्य इप्सा से किया यह काजा!८२!                                
पितृ हत्या स्वयं करवाये               
प्रेतयोनी यमराज धराये !८३!        
 राजा बहुत कष्ट जब पाया           
तत्काल दरिया की शरण में आया !८४!                                    
धर्म शास्त्र से न्याय बताया             
राम भजन का पंथ दिखाया!८५! 
राजा चित्त में बात छिपाया             
दोय छाब आगे धरवाया !८६!         
एक में लीद मींगणा भरिया           
एक छाब मिठाई धरिया !८७!       
दरिया बात अगम की जाने             
बोले आप वचन परमाने !८८!      
राजन यह प्रसाद बरतावो             
सर्व बांट दो मत घबरावो !८९!        
भूपति समझ गया सब बाता           
दीनन के दरियावजी दाता !९०!      
बगतसिंह को राम बताया            
मुक्ति होने की राह दिखाया!९१!  
दोहा                                         
दरिया मस्तक हस्त धर,किये ताप सब नष्ट !
 बगतसिंह चेला भया,किये दूर सब कष्ट (७).
चमत्कार इस विध बहु कीने            
दुनियाँ मन्त्र राम कर दीने !९२!        
 दरिया की याद दिलाता भाई.         
खेजड़ा खड़ा अरण्य के माँई!९३!                                   
भक्त लोग सब दर्शन जावे              
स्पर्श मात्र से पाप नशावे !९४!       
चमत्कार मनोहर कीने  
दरिया की शरण बलरामा लीने  !९५!         
सर्व धर्म का मूल कहाया           
रामस्नेही धर्म  चलाया    !९६!         
 देश देशान्तर महिमा भारी           
रामजी सब के प्राण अधारी!९७!     
सम्प्रति आचार्य श्री रेण विराजे        
महन्त क्षमारामजी राजै !९८!           
सम्वत अठाणूं गादी विराज्या       
सुर किन्नर का बाजा बाज्या!९९!                                 
 दरियाव शतक अब पूरा होई.         
राम राम रट राम ही जोई!१००! 
  दोहा                                         
चेत मास अति शोभना, अर्ज करे बलराम !
 सन्तन के आशीष से, पूर्ण होय सब काम (८).             

संत बलराम कृत इति श्री दरियाव शतक