Friday, 11 August 2017
Wednesday, 9 August 2017
चिन्तामणी का अंग / श्री दरियाव वाणी
चिन्तामणी का अंग
अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणिजी का "चिन्तामणी का अंग " प्रारंभ । राम !
चिंतामणि चौकस चढ़ी, सही रंक के हाथ ।
ना काहू के सँग मिलै , ना काहू से बात (1)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब किसी गरीब व्यक्ति को चिन्तामणी प्राप्त हो जाती है , तो वह किसी का संग नहीं करता है । क्योंकि यदि लोगों को पता लग गया तो यह खबर राजा तक पहुंच जाएगी तथा राजा उससे चिन्तामणी छीन लेगा । इसी प्रकार जो परमात्मा रूपी चिंतामणि प्राप्त महापुरुष होते हैं वे जगत का संग नहीं करते हैं । राम राम!
ना काहू के सँग मिलै , ना काहू से बात (1)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब किसी गरीब व्यक्ति को चिन्तामणी प्राप्त हो जाती है , तो वह किसी का संग नहीं करता है । क्योंकि यदि लोगों को पता लग गया तो यह खबर राजा तक पहुंच जाएगी तथा राजा उससे चिन्तामणी छीन लेगा । इसी प्रकार जो परमात्मा रूपी चिंतामणि प्राप्त महापुरुष होते हैं वे जगत का संग नहीं करते हैं । राम राम!
दरिया चिंतामणि रतन, धरयो स्वान पै जाय ।
स्वान सूंघ कानैं भया, टूकां ही की चाय (2)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब यह चिंतामणी कुत्ते के सामने रखी गई तो कुत्ता बेचारा चिंतामणी के पास आया, उसे सूंघा तथा सूंघकर दूर हो गया क्योंकि उसके मन में तो पेट भरने हेतु रोटी प्राप्त करने की ही इच्छा थी । जब तक परमात्मा की कीमत के विषय में हमें ज्ञान नहीं है, तब तक हम परमात्मा के नाम को स्वीकार नहीं कर रहे हैं । परन्तु जब सतगुरु की कृपा से भगवत नाम के विषय में जानकारी हो जायेगी, तब हम एक क्षण के लिए भी नाम को अपने हृदय से निकाल नहीं पायेंगे । राम राम!
स्वान सूंघ कानैं भया, टूकां ही की चाय (2)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब यह चिंतामणी कुत्ते के सामने रखी गई तो कुत्ता बेचारा चिंतामणी के पास आया, उसे सूंघा तथा सूंघकर दूर हो गया क्योंकि उसके मन में तो पेट भरने हेतु रोटी प्राप्त करने की ही इच्छा थी । जब तक परमात्मा की कीमत के विषय में हमें ज्ञान नहीं है, तब तक हम परमात्मा के नाम को स्वीकार नहीं कर रहे हैं । परन्तु जब सतगुरु की कृपा से भगवत नाम के विषय में जानकारी हो जायेगी, तब हम एक क्षण के लिए भी नाम को अपने हृदय से निकाल नहीं पायेंगे । राम राम!
दरिया हीरा सहस दस, लख मण कंचन होय ।
चिंतामणी एकै भला, ता सम तुलै न कोय (3)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हजारों की संख्या में हीरे हैं तथा कई लाख मन सोना है और चिंतामणी एक ही है , तथापि यह सारी संपति चिंतामणी की तुलना में नगण्य है । अतः महाराजश्री ने भगवत नाम को चिन्तामणी के समान बताया है । यदि आपने राम नाम का जाप कर लिया तो सब कुछ कर लिया । राम राम!
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हजारों की संख्या में हीरे हैं तथा कई लाख मन सोना है और चिंतामणी एक ही है , तथापि यह सारी संपति चिंतामणी की तुलना में नगण्य है । अतः महाराजश्री ने भगवत नाम को चिन्तामणी के समान बताया है । यदि आपने राम नाम का जाप कर लिया तो सब कुछ कर लिया । राम राम!
अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का चिंतामणी का अंग संपूर्ण हुआ । राम
आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com .
डिजिटल रामस्नेही टीम को धन्येवाद।
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दासानुदास
9042322241
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साध का अंग / श्री दरियाव वाणी
साध का अंग
अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का साध का अंग प्रारंभ ।
दरिया लक्षण साध का, क्या गिरही क्या भेख ।
निःकपटी निसंक रहे, बाहर भीतर एक (1)
आचार्यश्री दरियावजी महराज फरमाते हैं कि साधना करने वाले भेषधारी तथा गृहस्थी सभी साधकों को साधु कहते हैं । सच्चे साधु का तो यही लक्षण है कि वह सदा निष्कपटी और निःशंक रहता है तथा न ही कभी उसके मन में परमात्मा के प्रति किसी प्रकार का संशय उत्पन्न होता है । वह तो सदा बाहर भीतर एक रहता है । राम राम!
निःकपटी निसंक रहे, बाहर भीतर एक (1)
आचार्यश्री दरियावजी महराज फरमाते हैं कि साधना करने वाले भेषधारी तथा गृहस्थी सभी साधकों को साधु कहते हैं । सच्चे साधु का तो यही लक्षण है कि वह सदा निष्कपटी और निःशंक रहता है तथा न ही कभी उसके मन में परमात्मा के प्रति किसी प्रकार का संशय उत्पन्न होता है । वह तो सदा बाहर भीतर एक रहता है । राम राम!
सतगुरु को परसा नहीं, सीखा शब्द सुहेत ।
दरिया कैसे नीपजै , तेह बिहुणा खेत (2)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि सतगुरु के सानिध्य में नहीं आए तथा यूँ ही मनमुखी होकर राम-राम करने लग गये तो इससे कार्य की सिद्धि नहीं होगी । जिस प्रकार बिना तेह के अर्थात जब तक भूमी अंदर से गीली नहीं होती तब तक खेत में बीज नहीं ऊगता है । उसी प्रकार जिसने सतगुरु से हेत नहीं किया तथा शब्द से हेत कर लिया, उसका कभी कल्याण नहीं हो सकता । राम राम !
सत्त शब्द सतगुरु मुखी, मत गयन्द मुख दन्त ।
यह तो तोड़ै पोल गढ़, वह तोड़ै करम अनन्त (3)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जिस प्रकार हाथी से लगे हुए हाथी के दांत बड़े बड़े गढ़ों की पोल को नष्ट कर देते हैं । उसी प्रकार सतगुरु से लगा हुआ शिष्य अनन्तानन्त कठिन कर्मों को तोड़कर नष्ट कर देता है । राम राम !
दाँत रहै हस्ती बिना, तो पोल न टूटे कोय ।
कै कर धारै कामिनी, कै खेलाराँ होय (4)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो दाँत हाथी से अलग होता है , उसके तो केवल खिलोने अथवा स्त्रियों के हाथ के कंगन ही बन सकते हैं । उसके द्वारा पोल टूटनी तो असंभव है । उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में साधक ऐसे ही मनमुखी होकर, सतगुरू का आश्रय लिये बिना ही साधना करता है तो उसे साधना में सफलता मिलनी असंभव है । राम राम!
साध कह्यो भगवन्त कह्यो, कहै ग्रन्थ और वेद ।
दरिया लहै न गुरू बिना, तत्त नाम का भेद (5)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि मैं अकेला ही नहीं , सभी सन्त और भगवन्त अर्थात भगवान तथा ईश्वर कोटि के महापुरुष भी यही बात कहते हैं एवं वेदों तथा ग्रन्थों में भी यही बात आती है कि सतगुरु के बिना राम नाम के तत्व का भेद प्राप्त नहीं होता है । अतः तत्व के विषय में समझने के लिए ही सतगुरु की आवश्यकता है ।राम राम !
राजा बाँटै परगना, जो गढ़ को पति होय ।
सतगुरु बाँटै रामरस , पीवै बिरला कोय (6)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि पुराने जमाने में जो शूरवीर किसी बहुत बड़े संकट से देश को उबार लेते थे , उनके ऊपर प्रसन्न होकर राजा उन्हें गाँव वगैरह ईनाम में देते थे । इसी प्रकार सतगुरु रामरस बाँटते हैं परन्तु कोई बिरले ही उसे पी सकते हैं । प्रत्येक व्यक्ति रामरस नहीं पी सकता । राम राम!
मतवादी जानै नहीं, ततवादी की बात ।
सूरज ऊगा उल्लवा , गिनै अंधारी रात (7)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो व्यक्ति मत में बंधे हुए होते हैं, वे तत्ववादियों की बात नहीं जानते हैं । सूर्य उदय होने पर भी उल्लू तो यही समझता है कि अभी अंधेरी रात है । उल्लू बेचारा तो मत में बंधा हुआ अज्ञानी है । परमात्मा के प्यारे भक्त ही भगवत्कृपा से तत्व के गूढ़ रहस्य को जान सकते हैं । राम राम!
भीतर अंधारी भींत सो,बाहर ऊगा भान ।
जन दरिया कारज कहा , भीतर बहुली हान (8)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि बाहर सूर्य उदय हो गया है परन्तु भीतर में अन्धकार है तो इससे कोई लाभ नहीं होगा । अतः भीतर से प्रकाश होना आवश्यक है। अन्धकार का तात्पर्य अंतःकरण में अज्ञान से है जिसे अधिक से अधिक राम नाम जाप द्वारा मिटाया जा सकता है । राम राम!
सीखत ज्ञानी ज्ञान गम, करै ब्रह्म की बात ।
दरिया बाहर चाँदना , भीतर काली रात (9)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि झूठे ब्रह्मज्ञानी वेदों के चार पांच महावाक्यों का वर्णन करते रहते हैं कि मैं ही ब्रह्म हूँ । अतः मुझे भजन-ध्यान और धर्म पुण्य करने की क्या आवश्यकता है । इस प्रकार से बाहर तो प्रकाश होगा परन्तु भीतर अन्धेरा होगा तो कल्याण संभव नहीं है । भीतर में प्रकाश करने के लिए तो श्वासोश्वास नामजाप करना होगा । राम राम !
बाहर कुछ समझै नहीं, जस रात अंधेरी होत ।
जन दरिया भय कुछ नहीं, भीतर जागै जोत (10)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि बाहर तो अंधेरा है परन्तु यदि अंदर में प्रकाश है तो कोई भय की बात नहीं है । अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान तो है परन्तु भौतिक ज्ञान नहीं है तो उसका कल्याण अवश्य हो जाएगा । अध्यात्म ज्ञान हेतु महापुरूषों का संग ही परम सुख का साधन है । राम राम !
अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का साध का अंग संपूर्ण हुआ । राम राम
आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com .
डिजिटल रामस्नेही टीम को धन्येवाद।
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दासानुदास
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Friday, 4 August 2017
10. ईश्वर कृपा के प्रभाव को मनाना ही उसके स्वरूप को जानना है:
10. ईश्वर कृपा के प्रभाव को मनाना ही उसके स्वरूप को जानना है:
जो मनुष्य सुख दुख रूप प्राप्त परिस्तिथियों में सुख से हर्षित नही होता है तथा दुख से भयभीत नही होता है; दोनों ही परिस्तिथियों को ईश्वर का प्रसाद (वरदान)मानकर प्रसन्न रहता है, ऐसा सम दृष्टि साधक जीवन मुक्त हटाना माना गया है। वह इस संसार मे भाग्यशाली है । ईश्वर बहुत दयालु है। पापी से पापी एवं अत्याचारी से अत्याचारी भी यदि ईश्वर की शरण मे पहुँचकर अपने अपराधों की क्षमा याचना करके भविष्य में अपराध न करने की शपथ ले लेता है तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा करके उसे साधु रूप में स्वीकार कर अपना लेते है और शीघ्र ही उसके कल्याण करने की घोषणा कर देते है लेकिन खेद है कि यदि अज्ञानी मानव कल्यानवरुणालय दयालु राम की शरण मे नही जाता तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा लेकिन *यह दुर्भाग्य सतगुरु की कृपा से सौभाग्य में बदला जा सकता है*। सतगुरु ही दयालु राम की महिमा बताकर उसे दयालु राम की शरण मे पहुँच कर सुखी बना सकता है । अतः ईश्वर कृपा के प्रभाव को मनाना ही उनके स्वरूप को जानना है ।
*दरिया गुरु गरुवा मिला,कर्म किया सब रद्द। झूठा भ्रम छुड़ाय कर ,पकड़ाया सत शब्द।।*
*"सागर के बिखरे मोती"*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"*
9.नाद ब्रह्म-राम की सुंदरता:
9.नाद ब्रह्म-राम की सुंदरता:
भगति साधना में नाद (राम शब्द ब्रह्म) की बड़ी महिमा है । जब योगी यौगिक साधना -ध्यान योग द्वारा अहनिश (दिन-रात) आराधना साधना में लीन रहता है तब शब्द (नाद-ब्रह्म राम) कला की जागृति होती है तो उसे ध्यान साक्षात्कार काल में अनन्त अलौकिक दृश्य व जन तप स्वर्ग लोकों का दर्शन होता है । उसे करोड़ो सूर्यो के समान प्रकाश,अनन्त चंद्रमा की शीतलता व अनन्त आनन्द की अनुभूति होती है । जब अपनी वृत्ति (सूक्ष्म बुद्धि) से शब्द ब्रह्म के ध्यान काल में राम -राम शब्द सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करता है तब सम्पूर्ण शरीर मे प्रेम, प्रकाश,ज्ञान की शिराये फूटने लगती है । योगी ब्रह्म की अलौकिक सुंदरता को देखकर,अनुभव करके सुखी हो जाता है और उसकी सारी सांसारिक आशाएं इच्छाएं,आकांक्षाए नष्ट हो जाती है इस तरह उसका चित ब्रह्मकार हो जाता है ।
*अनन्त ही चंदा उगिया, सूर्य कोटि परकास। बिन बादल बरषा घनी,छह ऋतु बारह मास ।।*
*दरिया सुंन्न समाध की , महिमा घनी अनन्त ।पहुँचा सोई जानसी , कोई कोई बिरला सन्त ।।*
*"दरिया नाद प्रकासिया, सो छवि कही न जाय"*
*"सागर के बिखरे मोती"*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"*
8.एक धर्म ही साथ जाता है:
8.एक धर्म ही साथ जाता है:
मानव का सच्चा हितैषी उसका धर्म अर्थात अच्छे बुरे कर्म है । मृत्युलोक में धर्म को ही सर्वोपरि समझकर उसे अपने आचरण में घटित करना चाहिये । इस संसार मे कभी कही कोई भी किसी के साथ सदा नही रह सकता है । जिनसे हम जुड़े हुए है उनसे एक दिन अवश्य ही छूटना पड़ेगा । जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मर कर जाता है । अपनी करनी-धरनी(कर्तव्या कर्तव्य)का,पाप-पुण्य का फल भी अकेला ही भोगता है। यह मूर्ख जीव जिन्हें अपना समझकर अधर्म करके भी पालता- पोषता है। वे ही प्राण,धन और पुत्र आदि इस जीव को असन्तुष्ट एवं विलाप करते हुए छोड़ कर चले जाते है। मृत्यु के समय केवल एक धर्म (अच्छे-बुरे कर्म) ही साथ जाता है। वास्तव में खेद तो इस बात का है कि आज मानव अपने संकीर्ण पारिवारिक बन्धन के कारण अपने धर्म से विमुख होकर अपना लौकिक स्वार्थ भी भूल गया है क्योंकि जिनके लिये वह अधर्म करता है वे तो उसे छोड़ ही देंगे । इस लिये उसे अपने जीवन मे कभी भी सुख-संतोष का अनुभव नही होगा और अंत मे अपने अधर्म से अर्जित पापों की गठरी मृत्यु से पूर्व ही अपने सिर पर लाद कर स्वयं ही घोर नरक में जायेगा । इसलिये यह समझ जाना चाहिये कि यह दुनिया चार दिन की चांदनी है, सपने का खिलवाड़ है, जादू का तमाशा है और मनोराज्य मात्र है; अतः लोक परलोक बनाने हेतु मानव को चाहिये, कि वह सदा ही धर्म का आचरण करें ।
*मरना है रहना नही , जा में फेर न सार। जन दरिया भय मान कर,अपना राम संभाल।।*
*दरिया नर तन पाय कर ,किया न राम उचार । बोझ उतारन आइया, सो ले चले सिर भार ।।*
*"सागर के बिखरे मोती"*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"*
*"सागर के बिखरे मोती"*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"*
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