Wednesday, 8 May 2019
Friday, 19 April 2019
रेण धाम की आचार्य पीठपद परम्परागत वंशावली
रेण धाम की आचार्य पीठपद परम्परागत वंशावली
सर्वप्रथम मुलाचार्य श्री दरियावजी महाराज से दिव्य सन्देश पाकर महाराज श्री हरखाराम जी ने विक्रम संवत 1856 को पद भार संभाला।
आपश्री के 20 शिस्यो में प्रमुख शिष्य रामकरण जी महाराज जो कि आपके भतीजे यानी (बड़े भाई लिखमीचन्द जी महाराज के बड़े पुत्र)ने 77 वर्ष तक सन्त पंचों की सहायता से परम्परागत रामस्नेही गुरु धर्म का अत्यन्त कुशलता पूर्वक पालन किया।
रामकरण जी महाराज के परम धाम पधारने के पश्च्यात
समय सुयोग्य आचार्य की मांग कर रहा था। अतः सम्प्रदाय के थम्बायतो,सन्त- गरस्थियो ने जनतांत्रिक प्रणाली के अनुसार श्री भगवतदास जी महाराज से प्राथना की कि वे गद्दी का भार सम्भाल कर कृतकृत्य करे।अतः आप वि.सँ.1938 को आचार्य की गद्दी पर विराजमान हुवे।
ओर आपने 20 वर्ष 7 महीने 17 दिन प्रयत्न पूर्वक निरंतर देश, धर्म और सम्प्रदाय की उन्नति करते हुए 17 वे दिन परम धाम पधार गये
आप श्री के पश्च्यात आपके परम शिष्य आचार्य श्री रामगोपाल जी महाराज ने विक्रम संवत 1959 को रेण की सत्ता पद पर पदारूढ़ हुवे,आपने 39 बरसों तक रामस्नेही सम्प्रदाय का कुशलता पूरक संचालन किया।
रामगोपाल जी महाराज के पश्च्यात विक्रम संवत 1997 चैत्र कृष्णा तृतीया के दिन श्री श्रमाराम जी महाराज आचार्य पद की गद्दी पर आसीन हुए।
आपने जीव मात्र को सुखी करने के लिए कल्याण के अनेक कार्य किए व विक्रम संवत 2029 पोष कृष्णा तृतीया शनिवार को प्रातः 5 बजे आप परमधाम पधार गए।
तत्पश्चात रेण आचार्य पीठ के सभी सन्त व ग्रहस्थ भाईयों ने रेण पीठ के उत्तराधिकारी श्री बलरामदास जी महाराज से आचार्य पद संभालने की प्राथना की।यधपि आपकी इच्छा नही थी, पर परम्परा के नियम को पालने के लिये पांच (5 )मिनट आचार्यपीठ को स्वीकार करके गादी पर विराजमान हुवे।
तदन्तर तुंरत ही गादी का त्याग कर पूज्य शास्त्री जी ने विक्रम संवत 2029 पोष शुक्ला चतुर्थी के दिन आचार्य पीठ को मेरे प्यारे, सबसे न्यारे,मेरे प्राणाधार, मेरे हिवड़े रा हार, मेरे कलेजे रा कोर साक्षात् ईश्वर अंश श्री हरिनारायण जी शास्त्री जी महाराज को सुपुर्द कर दिया,जो आपके पाठवी प्रमुख शिष्य थे, को 8.1.1973 वार सोमवार प्रातः 11 बजकर 11 मिनट 11 सेकंड पर सभी सन्तो ओर उपस्थित गृहस्थों की बीच चादर ओढ़ा कर आपको आचार्य पद प्रदान कर दिया था।
श्री दरियाव जी महाराज के शिष्य श्री किशनदासजी महाराज की 'अनुभव गिरा' वाणीजी
घर अम्बर भी थिर नहीं, थिर है सिरजणहार ।।
किसनदास सबसूं कहे , सबही सिंवरो पीव ।
छूट जायगी देहङी , पीछे पिस्तावलो जीव ।।
किसनदास सबसूं कहे , सबही सिंवरो राम ।
काल पङोला काल बस , पीछे धरयो रहेलो काम ।।
किसनदास साबत शरीर, राम भजन कर लेह ।
पीछे काम न आवसी , जद पङे पुरानी देह ।।
किसनदास जोबन थकां , लीज्यो राम लडाय ।
चल जोबन आसी जुरा , जद पीछे लियो न जाय ।।
भले बुढ़ापो आवसी , सुद बुद जासी छूट ।
किसनदास काया नगर , जम लेजासी लूट ।।
राम नाम है किसनदास, बोहोतक लागे लंक ।
तीन लोक कजियो करे , तो बाल न हुवे बंक ।।
ऐकण ओली तीन लोक, ऐकण ओली राम ।
राम नाम ले किसनदास , तो आडा फिरे अनेक ।
तन मन अरपै रामकूं , तो विघ्न व्यापे ऐक ।।
अण आदर कीजे नहीं, कीजे घणा स्नेह ।
समे पधारे किसनदास, साध पाँवणा मेह ।।
टके पइसे गुरु घणा, किसना खासी ठोर ।
साहेबसुं भेटा करे , सो तो सतगुरु और ।।
किसनो चाकर आदि को , आज काल को नांहि ।
रामचन्द्र लंका चढया , जद भी किसनो मांहि ।।
बिन कंठी माला बिना, जल तारयो गजराज ।
किसनदास निज संत की , अवगत सुणी आवाज ।।
मन लागो बोहो मारगां तलबा तोङयो तन्न ।
किसनदास कैसे बणे , सरधा हीन भजन्न ।।
किसनदास निस दिन करे , राम भजन को गाड ।
बाहर भीतर ऐक रस , राम लडावो लाड ।।
राम नाम बिन झूठ है, किसनदास सब सार ।
राम नाम सिंवरया बिना, परत न उतरे पार ।।
जे बोलो तो राम कहो , जे जागो तो राम ।
जीमत पीवत किसनदास , सदा राम ही राम ।।
Wednesday, 24 October 2018
राम नाम की मस्ती .....
राम नाम की मस्ती.......
एक बार एक भक्त गुरुदेव के चरणो मे पहूंचा ओर गुरुदेव के चरणो मे प्रणाम करके उस भक्त ने कहा की-- मेरे गुरुदेव,,,जबसे मेरे जीवन मे राम नाम की मस्ती आयी है
तबसे दूनियावाले मेरा मजाक उडाने लगे है ओर वो सब मुझे देखकर मेरा नाम लेकर नही बुलाते बल्कि मुझे देखकर मेरा मजाक उडाते हुए मुझे राम राम कहते रहते है,,
वो कहते रहते है की अरे राम राम कहां जा रहा है ??
अरे राम राम खाना खाया या नही ??
अरे राम राम अब सो जा,---
गुरुदेव ईस प्रकार की बाते दूनियावाले मुझे बोलते है ओर मेरा मजाक उडाते है तो मुझे बहूत बुरा लगता है---
उस भक्त की ये सब बातें सुनकर गुरुदेव के ह्रदय मे आनंद भर आया ओर गुरुदेव ने कहा की-- बेटा फिर तु रोता क्यो है ??
ये तो राम जी की बहूत बडी कृपा है तुमपर की तुम्हारे जीवन मे राम नाम की मस्ती आई है
ओर तुझे दुनिया की मजाक वाली बाते सुनकर दुखी नही होना चाहिये बल्कि तुम्हे तो खुश होना चाहिये की तुम्हारी वजह से दूनियावालो के मुख से भी राम राम नाम निकलता है-
उनके मुख से राम नाम निकल रहा है यानि उनका भी कल्याण हो रहा है--
राम नाम की बहुत महिमा है--
कलियुग मे नाम की बहूत महिमा है इसलिए नाम चाहे कैसे भी लो,, नाम हर परिस्थिति मे कल्याण ही करता है---
हे मेरे गुरुदेव.....
मोह लिया आप ने मुझ को ऐसे
कुछ ना और दिखाई दे
राम के रस में मे ऐसे डूबे
हर तरफ राम जी राम राम राम दिखाई दे
🙏🏻राम जी राम राम राम राम🙏🏻
Thursday, 18 October 2018
श्री किशनदासजी महाराज की 'अनुभव गिरा' वाणीजी
किशनदास कर जोड़ के, वंदन बहुत करंत (1)
सतगुरू जन दरियाव सही , मन मान्या मेरे ।
शूरवीर सत वैण कहो , कुण पूठा फेरे (2)
मेट्या भ्रम अंधेर , किया गुरू ज्ञान उजाला ।
अखंड अमल भरपूर, सदा संग शिख मतवाल (3)
नैन बैण हरि हेत , सदा साहब का प्यारा (4)
'दरिया ' मेरू उलंघ , सुरती ब्रह्म चरणा लागी (5) दोहा
निराकार आकार बिच , जहं दरिया का बास ।
अगम अगोचर गम किया, देख्या किसनेदास {१}
छन्द
शिष मन को नारेल, मेल्हि गुरु चरणों आगे ।
प्रेम प्रीति जिज्ञास , चाह गुरु चरणों लागे (1)
भरम कर्म अघ पाप मिटै , गुरु दर्शन पाया (2)
सकल धर्म की याद, परम पद गुरु ने दीया (3)
होम यज्ञ आचार शील, समता गुरू सेवा ।
वाणी कथा विचार, दीन बंधु गुरु देवा (4)
भक्ति मुक्ति महामोक्ष , अमर अक्षय अविनाशी (5)
तारण तरण उदार, पार गुरु दरस्यां (6)
कौन बुझावे दाह , लाय कर्मों की लागी (7)
जन्म मरण मिट जाय , ज्योति मिल अक्षय जीवे (8)
भाग भला शिष्य गुरु मिला , दिल में रखे न दूज ।
चौपाई
बार बार सतगुरू समझावै , ऐसो जन्म बहुरि नहीं आवै ।
जामण मरण मिटैगा तैरा , यूं सत शब्द मान शिष मेरा ।
सत का शब्द मान शिष लीजै , सतगुरू शब्द कहै सो कीजै (2)
गुरू बिन नाम हाथ नहीं आवै , गुरू बिन पार कौन पहुंचावै ।
गुरु बिन सब तीर्थ फिर आवै , गुरू बिन मुक्ति मूल नहीं पावै ।
गुरू बिन मन मूक ज्ञान विचारे , गुरू बिन भरम बहुत पचहारे ।
गुरू बिन अगम निगम कुण बोले , गुरू बिन दसूँ द्वार कुण खोले ।
गुरु बिन हद में कौन हलावै , गुरु बिन बेहद कौन बतावै ।
गुरू बिन अन्धा बहुत अलूजै , गुरू बिन सत साहब नहीं सूजै ।
गुरु बिन कौन अष्टांग कमावे, गुरु बिन कौन प्रसिद्ध कहावे ।
गुरू बिन राम नाम कुण लागै , गुरू बिन भव सूता कुण जागै ।
भव सागर से पार उतारे , महा प्रलय सूं अवश्य उबारे ।
शिष कर जोड़ लग्या गुरु चरणा , कृपया दया मया कर घरणा ।
मैं मति हीन मार्ग नहीं जाण्या , पार ब्रह्म गुरू नहीं पहचाण्या ।
मैं कर्मी दुष्टि अहंकारी , पतित उधारण पर उपकारी ।
तुम गुरुदेव निरंजन निर्भय, शिष का शत्रु किया गुरू सब व्यय ।
तुम गुरूदेव महा सुख दीना , काग पलट हंसा कर लीना ।
गुरू बिन चेला कौन उबारै , गुरु बिन भवसागर कुण तारै ।
दोहा
वार पार गुरू गम अगम , अवगत अकल अनन्त ।
किशनदास वन्दन करै , नमो सिरजन हार (4)
गुरू बिन अन्धा वे सकल , गुरू बिन मूढ़ अजान ।
गुरु बिन भटकत बहु दिन बीता , गुरु बिन स्वाँग रहा सब रीता ।
गुरू बिन माया बहुत नचाया , गुरं बिन जोगी जगत हंसाया ।
गुरु बिन जोर कहावै जोसी , गुरु बिन अन्तकाल फिर रोसी ।
गुरू बिन झालर ताल बजावै , गुरु बिन माया बहुत मनावै ।
गुरू बिन आन-देव सब लूटै , गुरु बिन जीव कहो क्यों छूटै ।
गुरू बिन कौन सरोदा साजै , गुरु बिन गगन नाद किम गाजै ।
गुरु बिन निज निर्वाण न पावै , गुरु बिन अवधि एली गमावै ।
शब्द हीन सतगुरू नहीं कीजै , पारस छोड़ पत्थर क्यों लीजै ।
सतगुरू ऐसा कीजै भाई, परम ज्योति में ज्योति मिलाई ।
ज्यों दीपक बिन मंदिर अंधारा , यूं सतगुरू बिन साहब न्यारा ।
ऐसा है गुरुदेव हमारा , ' किशनदास ' सतगुरू का चेरा ।
जामण मरण महा डर मेट्या , 'किशनदास ' पूरा गुरु भेट्या ।
दोहा
'किशनदास ' ऐसो जनम , बार बार नहीं होय ।
सावधान साहब भजो , खबरदार! सब कोय (6)
राम-राम रसना रटौ , जब लग पिंजर श्वास ।
'किशनदास 'कीजै भजन होय दासन को दास (7)




































































