Monday, 23 May 2022

संत सद्गुरुदेव पूजनीय हैं।

श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुदेव के लिए न बंधन है और न मोक्ष है। अखण्ड ज्ञान से युक्त हैं अतः ब्रह्म हैं। शरीर दृष्टि से गुरुदेव एक मनुष्य दीखते हैं पर मनुष्य नहीं हैं। जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण मनुष्य दीखते थे, पर मनुष्य नहीं वे ब्रह्म थे। सब प्रकार के भेद भावों से रहित थे। उसी प्रकार गुरु साक्षात परं ब्रह्म हैं। जैसे मदिर में अर्चा विग्रह से विराजकर प्रभु दर्शन और सेवा का सुूयोग हमको देते हैं उसी प्रकार गुरुदेव का स्थूल विग्रह कृपा विग्रह है। हमें इसी का दर्शन प्राप्त है। इसी की सेवा और ध्यान संभव है, व्याप्त का नहीं। संत सद्गुरुदेव पूजनीय हैं।

Saturday, 5 February 2022

सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:- (4)


-:सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:- (4)

हम सब अभी जिस लोक में बैठे है उसको मृत्यु लोक कहते है। यहां जिसने जन्म लिया, फिर चाहे उसकी उम्र लाख वर्ष की ही क्यों न हो, उसको जाना ही पड़ेगा। देखो, हम सब कई बार जन्मने मरने के कारण बहुतों के माता, पिता, भाई, बहिन हो चुके है। पिछले जन्म में हमारे अनेक सम्बन्धी थे परन्तु उस सम्बन्ध के समाप्त हो जाने से उनके सुख-दुख से हमारे सुख-दुख पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सुख-दुख स्वार्थ से होते हैं और अब हमारा उन भूतकाल के सम्बन्धियों से कोई स्वार्थ सिद्ध नहीं होता इसलिए उनके सुख-दुख का हमारे सुख-दुख से कोई सम्बन्ध नहीं।
संसार में मनुष्यों का जो एक दूसरे से सम्बन्ध है वह कर्मों के अनुसार है, सो, मनुष्य माता, पिता, पति, भाई बनकर अपना-अपना लेना-देना पूरा कर लेते हैं। अब थोड़ा विचार करके देखो कि इन नकली और नाशवान माता पिता, भाई बहिन के बिछोह में हम कितने दुखी होते हैं जब कि हमारे जन्म-जन्म के पिता, कभी न मरने वाले, नित्य के साथी रामजी के विछोह में तनिक भी दुखी नहीं होते। यदि हम एक बार भी राम के बिलोह में वास्तविक रूप से दुखी हो जाएं तो सदा सर्वदा के लिए जन्म-मरण का दुख मिट जायगा।

सब जीव उस परम पिता की आज्ञा से संसार में कर्मों के अनुसार जन्म लेते हैं और अपनी खोटी-खरी कमाई करके चले जाते हैं। संसार केवल सराय है। थोड़ा विचार करो, कि पति और देवर लड़की के लिये कितने दिन से पति और देवर है ? सगाई हुई जब से। जब वही लड़की पांच सात वर्ष की थी तो ये लोग उसके क्या थे ? कुछ नहीं। बस तो फिर, जो पहले कुछ नहीं थे वे अब भी कुछ नहीं है। बीच में कुछ समय के लिए स्वप्नवत कुछ सम्बन्ध सा हो गया था। वह नाता टूटने पर कोई किसी का नहीं। इसके विपरीत रामजी का नाता अजर-अमर है और सदा एक सा रहने वाला है। जो रामजी से नाता जोड़ लेता है वह भी अजर अमर हो जाता है। भगवान जिस दशा में रखते हैं उसी में खुशी से रहना चाहिए क्योंकि हम उसके कार्य को समझ नहीं सकते। न जाने हमारे लिए वह क्या ठीक समझता है। हमारा काम यह है कि हम, सदा-सोहागिन मीरा की तरह अपने अजर-अमर वर, राम के साथ प्रेम सगाई करके उसी की गोद में जा बैठे।
रामजी सदा ही प्रेम के ग्राहक है। प्रेमी भक्तों का माहेरा भरते है रथ हांकते हैं, पैर धोते हैं, और संसार में कोई काम नहीं जो रामजी अपने भक्त के लिये नहीं करते। बस, जब हमारा ऐसा पिता है तो हम दुखी क्यों होते हैं ? इसलिए कि हम समझते नहीं। रामजी तुम्हारे पास ही है, बस, पकड़ लो उनका हाथ और रो-रो कर जो चाहो मांग लो। परन्तु सावधान, सत्य और अविनाशी वस्तु मांगना नहीं तो नाशवान वस्तु नष्ट होने पर अभी की तरह फिर रोना पड़ेगा। सच्ची और नाशरहित वस्तु तो स्वयं राम ही हैं। कहीं भूल कर भी तुमने दूसरी वस्तु मांग ली तो रामजी तुमको वह वस्तु देकर स्वयं तुम से दूर रह जायेंगे। बड़ा आश्चर्य है कि राम के रहते हम दुखी है। उनसे बातें करो, वे तुम्हारी सब सुनेंगे और मन लगा कर सुनेंगे और सब इन्तेजाम खुद करेंगे। परन्तु कोई सुनाने वाला हो तब तो ? सब लोग जगत को अपना दुख सुनाते फिरते हैं परन्तु जगपति को कोई नहीं सुनाता। जगत तो बेचारा स्वयं दुखी है। जगतपति रामजी को एक बार प्रहलाद की तरह पुकारों, ध्रुव की तरह पुकारो, मीरा की तरह पुकारो, । इनका राम से सम्बन्ध था वही सम्बन्ध राम से हमारा भी है। वह है झक मारकर सुनेगा, नाचेगा, लटके करेगा, परन्तु कोई नचाने वाला हो तब तो। बस, अब समझ रखो कि तुम रामजी की गोद में हो। वह जो कुछ करता है हमारे लिए ठीक करता है। हम उसके काम को समझते नहीं इसलिए दुखी होते हैं। यह भूल हमारी है कि हम उसके काम में खोट निकालते हैं। तुम उसकी गोद में बैठे हो, बल्कि उसके पेट में बैठे हो परन्तु ऐसा न मानने से दुखी हो । मानली तो तुम सुखी बन जाओगे और फिर तुम जगत को भी सुखी बना सकोगे क्योंकि ऐसा करने की शक्ति तुम में आजाएगी। इससे बढ़कर न शान है, न ध्यान है। राम मंत्र भगवान को नचाने का उपाय है। भजन-भरोसा रखो। राम राम

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Sunday, 30 January 2022

सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:- (3)

-:सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:-

                                      (3)

आप और हम प्रायः पढ़ते और सुनते हैं। पढ़ना और सुनना अच्छी बात है, परन्तु हम उसको जीवन में नहीं उतारते इसलिए शांति नहीं मिलती। आज का युग प्रायः श्रवण और कथन का ही युग हो रहा है। पूर्वकाल में कहना, सुनना और करना साथ-साथ चलता था जो कि सन्तों के जीवन को देखने से समझ में आता है। क्या करना उचित है ? इसका उत्तर यही है कि इच्छाओं के कारण को जानकर सम्बन्ध का त्याग कर देना चाहिए। भजन करने से भी ऐसा ही परिणाम होता है। भजन से वासना मिट जाती है ओर जन्म वासना से ही होता है। शरीर अभिमान पर आश्रित है और अभियान अज्ञान पर। अज्ञान विचार से मिटता है। प्रभु ने हमको विचार शक्ति देकर ही मानव बनाया है। यह विचार शक्ति वर्तमान के मोह से तक गई है इसलिए उपरोक्त रीति से सुधार करना चाहिए। भजन से भी यही फल होगा।

सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:- (2)

-:सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:-               
                               (2)

श्री अनन्त सतगुरुदेव को कोटि-कोटि प्रणाम। हे सतगुरु तु सचमुच हमारी माता भी हो और पिता भी हो। हे देवादिदेव आपकी सेवा में हमारे दोनों हाथ एवं मस्तक है। इस अविद्या के सृष्टि में आपके सिवाय हमारा न कोई हुआ है, न होगा। आप अपार हो। आपका ऐश्वर्य मन, और बाणी की पहुँच के परे है। सतगुरु आप अनिर्वचनीय हो और आपका प्रभाव भी अनिर्वचनीय है। 
हे सतगुरु आप सर्वेश्वर और हमारे सिरताज हो हे सतगुरु, हृदय में आपकी समृति आते ही विषमता और दृश्यवर्ग अधिष्ठान में लय हो जाते है। कोई भी इन्द्रियगोचर और मन-गोचर पदार्थ उसी प्रकार नहीं दीखता जिस प्रकार कि नमक का ढेला पानी में नहीं दीखता हे सतगुरु, प्राणों के आधार, प्राणों के नाथ, केवल आप ही । आप रह जाते हो, अन्य कुछ नजर ही नहीं आता। आपके प्रभाव रूपी प्रसाद का पता लगते ही जगत का अवशेष तक नहीं रहता। आप ही अपने आप में पूर्ण, सब गोचर वस्तुओं से अतीत, सब के जीवन रूप में अपने आपको प्रकट कर देते हो। हे दयानिधि, हमारी अल्प शक्ति आपको कैसे जान सकती है ? आप दयानिधि है, दया के केन्द्र है। आप अतुल्य हैं, आप असीम है। आप अविषम है, आप अपार है। आपको प्रणाम करते समय भावना रुपी प्रबल शक्ति भी संकुचित हो जाती है। तो भी हे नाथ, आपकी परम हितैषी शक्ति आवरण रूपी अज्ञान का निवारण करने में कितना उत्कृष्ट प्रभाव दिखाती है। मनुष्य के द्वन्द, संकल्प-विकल्प और विषमता के सूक्ष्म परमाणुओं को मिटाने वाली आपकी लालसा कितनी प्रिय और आश्चर्यजनक है। द्वन्द को जड़से मिटाने वाली आपकी द्वन्दातीत शक्ति अभेद को स्वीकार करती हुई भेद और भिन्नता को छिन्न-भिन्न करती है। हे सतगुरु आप सत्य स्वरूप और अनोखे देव हो। आप अमृत रूपी विवेक का प्रसाद देने के लिए ही अवतार लेते हो। आप अम्बा हो, आप पिता हो। आपके समान न कोई हुआ, न होगा।

हमारे सभी महापुरुषों की निधि गुरुधर्म है। उपरोक्त शब्द साक्षात श्री सतगुरुदेव दरियाव महाराज की गाथा है। इसका स्मरण करते हुए जल में पत्थर डूबता है उस प्रकार डूब जावो।
राम राम

सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:-1

-:सतगुरु दाताश्री गुलाबदास जी महाराज के पत्र:-

                                   (1)

अपनी और कोई गलती नहीं, गलती केवल यही है कि राम-राम कम हुआ है, सो इस गलती को राम-राम अधिक करके दूर करो। भगवान से प्रार्थना करो।

देखो, इन्द्र, वरुण, कुबेर, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, और पवन के समान होने पर भी मनुष्य यदि केवल अपनी देह का भरण-पोषण करके इन्द्रियों को सुख पहुँचाने वाला है तो वह मनुष्य अभागा है। वह अभागा इसलिए है कि उसकी इस नाशवान शरीर में ममता है, इस मिटने वाली वस्तु में आसक्ति है। इसके विपरीत सौभाग्यशाली मनुष्य वह है जो ब्रह्माजी से लेकर कीड़ी (चिंउटी) तक में श्री रामजी महाराज के दर्शन करे अर्थात अनुभव करे कि

देही देवल बिच आतम पूजा। - देव निरंजन और न दूजा ।।

साथ ही मंत्रराज का जिव्हा से स्मरण करे। मंत्रराज का हृदय में, कंठ में, नाभि में और बैखरी बाणी में दर्शन करे। ऐसा मनुष्य भाग्यशाली है। मंत्रराज का ध्यान करते समय ऐसा भाव रखना चाहिए कि 'रा' रुपी सूर्य में अन्धेरा कैसा ? 'म'रुपी चन्द्रमा में तपन कैसी ? राम रुपी अग्नि के सामने कर्म रुपी काष्ठ कैसे ? गुरु महाराज की बताई हुई विधि से ध्यान करना चाहिए।

दाता दरियाव महाराज स्वयं फर्माते हैं:

दरिया तीनों लोक में ढूंढ़या सब ही धाम। 
तीरथ व्रत विधि करत बहु, बिना राम किस काम।।
उपरोक्त रीति से जो जीवन बनाते हैं वे बड़भामी है। इस 'र' कार और 'म' कार को शिवजी महाराज ने मंत्रराज नाम दिया है।

                            -:दोहा:-

तीन लोक चवदह भुवन ढूंढ़ा सब ही धाम। 
दरिया देख्या निरख कर राम सरीखा राम ।।
 भाव मिला परभाव से धर कर ध्यान अखंड़। 
दरिया देख्या ब्रह्म को न्यारा दीसै पिंड।।
 पांच तत्व गुण तीन से आतम भया उदास । 
सरगुण निरगुण से मिला चौथा पद में बास।।
 माया वहां न संचरै जहां ब्रम का खेल।
 जन दरिया कैसे बने रवि रजनी का मेल ।। 
जीव जाति से बीछड़ा घर पंच तत्व का भेख । 
दरिया निज घर आइया पाया ब्रह्म अलेख।। 
जाति हमारी ब्रहम् है मात-पिता है राम। 
गृह हमारा सुन्न में अनहद में विश्राम।।

जन दरियाव तुम्हारा दर्शन

*जन दरियाव तुम्हारा दर्शन*

जन दरियाव  तुम्हारा दर्शन, 
भाग भला सोई पावे ॥ टेक ॥ 

सप्तपुरी रायण में प्रगटे, 
दरस परम सुख पावे ।। १ ।।

नाम जहाज भवसागर मांही, बेठत पार लगावे ॥ २ ॥

 देस देस का रामसनेही, 
हिल मिल मंगल गावे ।। ३ ।। 

तपो भूमि में जो कोई आवे, 
करम सकल मिट जावे ॥ ४ ॥ 

कामी क्रोधी और मति हीना, व्याभिचारी टल जावे ।। ५ ।। 

'दर्सण आवे परम पद पावे, आवागमन मिट जावे ॥ ६ ॥ 

सिवसनकादिक और ब्रह्मादिक, मिल नारद जी आवे ।। ७ ।।

 स्वर्ग लोक से सकल देवगण, निसदिन महिमा गावे ।। ८ ।।

 गढ गिरनार मुनीश्वर आवे, 
चरणां सीस नमावे ।। ९ ।। 

मरुधर पुरी जहाँ रायण, 
राजा दर्सण आवे ।। १० ।। 

पूरणदास दासन के दासा, मनवांछित फल पावे ।। ११ ।।