Friday, 15 May 2015

दिव्य वाणी जी

बिरही प्रेमी मोम-दिल, जन दरिया नि: काम ।।
आसिक दिल दीदार का ,जासे कहिये राम ।।
यहाँ आचार्यश्री ने उन व्यक्तियों के लक्षण बताए हैं, जो उपदेश
सुनने के अधिकारी है । जो बिरले है अर्थात् जो परमात्मा की
आवश्यकता समझकर उनके लिए रोते रहते है तथा जो राम के प्रेमी है
उन्हें ही उपदेश सुनाना चाहिए । जिनका हदय परमात्मा की चर्चा सुनकर
द्रवीभूत हो जाता है तथा जिनके जीवन में परमात्मा प्राप्ति के अलावा
अन्य किसी प्रकार की कामना नहीं है उन्हें उपदेश दिया जाए तो वह
उपदेश सार्थक होता है । जिस व्यक्ति के हदय में करुणा और मैत्री के
भाव नहीं है वह उपेदेश का पात्र नहीं माना गया है । मैंत्री और करुणा
के भाव ही व्यक्ति को भगवत् भक्ति हेतु पात्रता का अधिकार प्राप्त
कराते है । अत: महाराजश्री कहते है कि जिसके दिल में परमात्मा के
दिदार (मिलन) हेतु आस्तिकता है उसे ही राम नाम का उपदेश देना
चाहिये।

Wednesday, 13 May 2015

अपना कल्याण करना है तो सांसो सांस राम राम करो

आचार्यश्री दरियावजी महाराज कहते है कि यदि तुम्हारी इच्छा
अपना कल्याण करने की है तथा इसी जन्म में इसी दिन और अभी मोक्ष
की प्राप्ति करना चाहते हो तो एक ही लक्ष्य को बना तो और एक ही
ध्येय को अंत:करण में स्थान दे दो की मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है है
ऐसा निश्चय हो जाने से सांसोसांस में निरंतर राम-राम ध्यान आरंभ
हो जाता है । इसीलिए निरंतर अजपाजाप चलना आवश्यक है । जिससे
पुरे शरीर में रोम-रोम में राम-राम होने लग जाता है उसे ही अजपाजाप
कहते है ।

Tuesday, 12 May 2015

राम नाम की महिमा

एक बार राम नाम के प्रभाव से कबीर पुत्र कमाल द्वारा एक कोढ़ी का कोढ़ दूर हो गया। कमाल को गरूर हो गया कि वह रामनाम की महिमा को जान गया है। कबीर जी को अपने बेटे के इस व्यवहार से बहुत दुख हुआ। उन्होंने कमाल का गरूर उतारने के लिए उसे तुलसीदास जी के पास भेजा।
तुलसीदास जी ने तुलसी के पत्र पर राम नाम लिखकर वह पत्र जल में डाला और उस जल से 500 कोढ़ियों को ठीक कर दिया। कमाल समझ गया कि तुलसी पत्र पर एक बार राम नाम लिखकर उसके जल से 500 कोढ़ियों को ठीक किया जा सकता है। रामनाम की इतनी महिमा है। जब वह घर लौटा तो कबीर जी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कमाल को भेजा सूरदास जी के पास।
सूरदास जी ने गंगा में बहते हुए एक शव के कान में 'राम' शब्द का केवल 'र' कार कहा और शव जीवित हो गया। तब कमाल ने सोचा कि 'राम' शब्द के 'र' कार से मुर्दा जीवित हो सकता है – यह 'राम' शब्द की महिमा है। इस वृतांत के उपरांत कमाल का गरूर उतर गया और उसने जाकर अपने पिता से क्षमा मांगी तब कबीर जी ने कहाः
'यह भी नहीं। इतनी सी महिमा नहीं है 'राम' शब्द की।
भृकुटि विलास सृष्टि लय होई।
जिसके भृकुटि विलास मात्र से प्रलय हो सकता है, उसके नाम की महिमा का वर्णन तुम क्या कर सकोगे?

राम से बड़ा राम का नाम

राम से बड़ा राम का नाम !!!
राम नाम ही परमब्रह्म है
एक नाम जाप होता है और एक मंत्र जाप होता है . राम नाम मन्त्र भी है और नाम भी . राम राम राम ऐसे नाम जाप कि पुकार विधिरहित होती है . इस प्रकार भगवान को सम्बोधित करने का अर्थ है कि हम भगवान को पुकारे जिससे भगवान कि दृष्टि हमारी तरफ खिंच जाए .जैसे एक बच्चा अपनी माँ को पुकारता है तो उन माताओं का चित्त भी उस बच्चे की ओर आकृष्ट हो जाता है , जिनके छोटे बच्चे होते हैं . पर उठकर वही माँ दौड़ेगी जिसको वह बच्चा अपनी माँ मानता है .
करोड़ों ब्रह्माण्ड भगवान के एक - एक रोम में हैं बसते हैं . दशरथ के घर जन्म लेने वाले भी राम है और जो निर्गुण निराकार रूप से सब जगह रम रहें है , उस परमात्मा का नाम भी राम है . नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण राम दोनों से बड़ा है .
भगवान स्वयं नामी कहलाते हैं . भगवान परमात्मा अनामय है अर्थात विकार रहित है . उसका न नाम है , न रूप है उनको जानने के लिए उनका नाम रख कर सम्बोधित किया जाता है , क्योंकि हम लोग नाम रूप में बैठे हैं इसलिए उसे ब्रह्म कहते हैं . जिस अनंत, नित्यानंद और चिन्मय परमब्रह्म में योगी लोग रमण करते हैं उसी राम-नाम से परमब्रह्म प्रतिपादित होता है अर्थात राम नाम ही परमब्रह्म है .
अनंत नामों में मुख्य राम नाम है . भगवान के गुण आदि को लेकर कई नाम आयें हैं, उनका जप किया जाये तो भगवान के गुण , प्रभाव, तत्व ,लीला आदि याद आयेंगें . भगवान के नामों से भगवान के चरित्र की याद आती है . भगवान के चरित्र अनंत हैं . उन चरित्र को लेकर नाम जप भी अनंत ही होगा .
राम नाम में अखिल सृष्टि समाई हुई है
वाल्मीकि ने सौ करोड़ श्लोकों की रामायण बनाई , तो सौ करोड़ श्लोकों की रामायण को भगवान शंकर के आगे रख दिया जो सदैव राम नाम जपते रहते हैं . उन्होनें उसका उपदेश पार्वती को दिया . शंकर ने रामायण के तीन विभाग कर त्रिलोक में बाँट दिया . तीन लोकों को तैंतीस - तैंतीस करोड़ दिए तो एक करोड़ बच गया . उसके भी तीन टुकड़े किए तो एक लाख बच गया उसके भी तीन टुकड़े किये तो एक हज़ार बच और उस एक हज़ार के भी तीन भाग किये तो सौ बच गया . उसके भी तीन भाग किए एक श्लोक बच गया . इस प्रकार एक करोड़ श्लोकों वाली रामायण के तीन भाग करते करते एक अनुष्टुप श्लोक बचा रह गया . एक अनुष्टुप छंद के श्लोक में बत्तीस अक्षर होते हैं उसमें दस - दस करके तीनों को दे दिए तो अंत में दो ही अक्षर बचे भगवान् शंकर ने यह दो अक्षर रा और म आपने पास रख लिए . राम अक्षर में ही पूरी रामायण है , पूरा शास्त्र है .
राम नाम वेदों के प्राण के सामान है . शास्त्रों का और वर्णमाल का भी प्राण है . प्रणव को वेदों का प्राण माना जाता है . प्रणव तीन मात्रा वाल ॐ कार पहले ही प्रगट हुआ, उससे त्रिपदा गायत्री बनी और उससे वेदत्रय . ऋक , साम और यजुः - ये तीन प्रमुख वेद बने . इस प्रकार ॐ कार [ प्रणव ] वेदों का प्राण है . राम नाम को वेदों का प्राण माना जाता है , क्योंकि राम नाम से प्रणव होता है . जैसे प्रणव से र निकाल दो तो केवल पणव हो जाएगा अर्थात ढोल हो जायेगा . ऐसे ही ॐ में से म निकाल दिया जाए तो वह शोक का वाचक हो जाएगा . प्रणव में र और ॐ में म कहना आवश्यक है . इसलिए राम नाम वेदों का प्राण भी है .
नाम और रूप दोनों ईश्वर कि उपाधि हैं . भगवान् के नाम और रूप दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि है . सुन्दर, शुद्ध , भक्ति युक्त बुद्धि से ही इसका दिव्य अविनाशी स्वरुप जानने में आता है .
राम नाम लोक और परलोक में निर्वाह करने वाला होता है . लोक में यह देने वाला चिंतामणि और परलोक में भगवत्दर्शन कराने वाला है. वृक्ष में जो शक्ति है वह बीज से ही आती है इसी प्रकार अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा में जो शक्ति है वह राम नाम से आती ही .
राम नाम अविनाशी और व्यापक रूप से सर्वत्र परिपूर्ण है . सत् है , चेतन है और आनंद राशि है . उस आनंद रूप परमात्मा से कोई जगह खाली नही , कोई समय खाली नहीं , कोई व्यक्ति खाली नही कोई प्रकृति खाली नही ऐसे परिपूर्ण , ऐसे अविनाशी वह निर्गुण है . वस्तुएं नष्ट जाती है, व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं , समय का परिवर्तन हो जाता है, देश बदल जाता है , लेकिन यह सत् - तत्व ज्यों -त्यों ही रहता है इसका विनाश नही होता है इसलिए यह सत् है .
राम नाम कि महिमा
1) जीभ वागेन्द्रिय है उससे राम राम जपने से उसमें इतनी अलौकिकता आ जाती है की ज्ञानेन्द्रिय और उसके आगे अंतःकरण और अन्तः कारण से आगे प्रकृति और प्रकृति से अतीत परमात्मा तत्व है , उस परमात्मा तत्व को यह नाम जाना दे ऐसी उसमें शक्ति है .
2 ) राम नाम मणिदीप है . एक दीपक होता है एक मणिदीप होता है . तेल का दिया दीपक कहलाता है मणिदीप स्वतः प्रकाशित होती है . जो मणिदीप है वह कभी बुझती नहीं है . जैसे दीपक को चौखट पर रख देन