Tuesday, 14 November 2017

48. निष्काम कर्म ही सुख प्रदाता है

48. निष्काम कर्म ही सुख प्रदाता है

सभी प्राणियों से मनुष्य जन्म ही श्रेष्ठ है क्योंकि मनुष्य योनि ज्ञान व विज्ञान के मूल स्रोत है । जो इस दुर्लभ मानव शरीर को प्राप्त करके भी अपने आत्मस्वरूप परमात्मा को नही जान लेते उसे अन्य किसी योनि में भी शांति नही मिल सकती । सांसारिक सुखों के लिये जो चेष्टायें की जाती है , वे सुख के बजाय दुख देती है । सभी स्त्री पुरुष सुख प्राप्ति के लिये तथा दुखो से मुक्ति पाने के लिये कर्म करते है ,लेकिन न तो उनके दुख दूर होते है और नही उन्हें सुख मिलता है । सुखों की प्राप्ति तभी सम्भव है जब प्राणी मात्र को भगवत्स्वरूप मान कर निष्काम सेवा भाव से कर्म करें ।

*दरिया सुमिरे राम को कोट कर्म की हान। जम ओर काल का भय मिटे ना काहू की कान।।*

रेंन पीठाधीश्वर " श्री हरिनारायण जी शास्त्री"

🌸सागर के बिखरे मोती

47. हिन्दू धर्म को आत्मसात करना ही नैतिक दायित्व:

47. हिन्दू धर्म को आत्मसात करना ही नैतिक दायित्व:

हिन्दू धर्म विश्व का श्रेष्ठ एवं महान धर्म है । इसके उदात्त गुणों को आत्मसात करते हुए ही अपना जीवन व्यतीत करना देश के प्रत्येक हिन्दू का नैतिक दायित्व है। हिन्दू धर्म व संस्कृति की श्रेष्ठता के आधार पर ही देश का नाम हिंदुस्थान पड़ा ।यहाँ की धर्म निष्ठ जनता के कारण ही विश्व इतिहास में हिंदुस्थान का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। दीनदुखियों की सेवा व परोपकार से मानव जीवन सफल होता है। किसी को धोखा देना व किसी की आत्मा को कष्ट पहुचना सबसे बड़ा पाप व अधर्म है । मनुष्य को ,काम,क्रोध,लोभ,मोह, अभिमान ,निंदा और स्वार्थ को त्यागकर पूर्ण धार्मिक जीवन व्यतीत करना चाहिए। इनके परित्याग से हृदय नितान्त व निर्मल होता है और चित्त में अलौकिक शांति व शुद्धता उत्पन्न होती है ।

*राम बिना तो ठौर नही रे, जह जावे तह काल।जन दरिया मन उलट जगत सु अपना राम सम्भाल।।*

रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"

🌸"सागर के बिखरे मोती"🌸

46. जीव ईश्वर से अलग नही है:

46. जीव ईश्वर से अलग नही है:

जीव ईश्वर का ही एक भाग है जिस तरह कोई प्राण अपने शरीर के अंगों को शरीर से अलग नही मानता उसी तरह ईश्वर के सभी जीव अंग होने से अलग नही है अतः प्राणी मात्र को ईश्वर का परिवार मानकर सबसे प्रेम करना चाहिए। मनुष्य को परमात्मा से अलग मानने वाला भगवान का भगत नही हो सकता। ईश्वर अंशी तथा जीव अंश है अतः ऊंच नीच,छोटा बड़ा तथा जाति धर्म के नाम पर विभाजन और अलगाव की धारणाए मिथ्या है आज के वैज्ञानिक युग मे मानव भौतिक दासता में अबर्द्ध होता जा रहा है और दानवता पूर्ण व्यवहार करता हुआ भयंकर मोह माया के पाश में आबद्ध होकर मृत्यु के मुख में जाने को तैयार है जबकि भगवान मानव मात्र को परम सुखी व अजर अमर बनाने के लिए अनादि काल से सन्देश देते रहे है।

*बूंद के माही समुंद समाना, राई में पर्वत डोले।चींटी माही हस्ती बैठा, घट में अघटा बोले।।*

स्पष्ट है कि इस पद में समुन्द्र ,पर्वत,हस्ती एवं अशरीरी शब्द "ईश्वर" के विराट रूप को प्रगट कर रहे है तथा बूँद, राई पिपीलिका और शरीर जीव के रूप को प्रगट कर रहे है।

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🌸सागर के बिखरे मोती🌸
रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"

45. आनंद आत्मा में ही है

45. आनंद आत्मा में ही है

सांसारिक विषयो में आनंद नही है किन्तु अंतःकरण में आत्मा का प्रतिबिम्ब पड़ने से, आनंद सा प्रतीत होता है । जगत के क्षणिक विषयो में जब तक मन फ़सा हुआ है । तब तक वास्तविक सच्चे आनंद की प्राप्ति नही होगी। लौकिक असत वासना से मन बिगड़ता है। वासना का नाश सत्संग,नाम जप से ही संभव है । मन को स्थिर करने के लिये राम नाम जप करते हुये महापुरूषो का संग करना चाहिए। जप व सत्संग से मन की मलिनता और चंचलता दूर होती है । अज्ञानी मानव विषयो में आनंद ढूंढता है जबकि आनंद आत्मा में ही है।

*जन दरिया गुरुदेव जी सब विधि दई बताय। जो चाहो निज धाम को सांसों उसांसो धयाय।।*

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🌸 *सागर के बिखरे मोती 🌸*
   *रेण पीठाधीश्वर श्री हरिनारायण जी शास्त्री*

44.मानव मात्र को ईश्वर का ही स्वरूप समझकर उसकी सेवा करें:

44.मानव मात्र को ईश्वर का ही स्वरूप समझकर उसकी सेवा करें:

✍जिन लोगों के कर्म ईश्वर अर्पण बुद्धि से होते है, जिनका सारा समय ईश्वर व ईश चर्चाओं में व्यतीत होता है, ऐसे लोग गृहस्थाश्रम में रहें तो भी घर उनके बंधन का कारण नही होते हैं । गृहस्थ में रहते हुए भी अपने जीवन को ईश्वरार्पित करके मानव मात्र को ईश्वर का ही स्वरूप समझकर शुद्ध बुद्धि से पद पद पर उनकी सेवा करनी चाहिये।
यही ईश्वर की सच्ची पूजा है।👌

*जात पांत कारण नही कोई,सब ही का हरि एको होई।ऊंच नीच नही कोई,सब ही नर प्रभु संतति होई।।*

🌸" *सागर के बिखरे मोती "🌸*

✍रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी महाराज"

Friday, 10 November 2017

43. दुखियों को सुख देना ही सर्वोत्तम धर्म है

43. दुखियों को सुख देना ही सर्वोत्तम धर्म है
✍आज देश व विश्व की परिस्थितियों को देखते हुए देश की अखंडता की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है। आज भारत मे धर्म ,जाति, सम्प्रदाय,भाषा एवं प्रान्तीयता की विघटनकारी संकीर्ण भावनाएं बढ़ती जा रही है जिनके कारण एकता व मानवीय तत्व स्नहे सद्भाव नष्ट हो रहे है । देश की व मनावता की पुकार प्रत्येक देशवासी के हृदय में तन मन धन वचन से एक दूसरे की सहायता करने और संगठित रहने की प्रेरणा देती है कोई भी धर्म हिंसा करने की शिक्षा नही देता है ।
धर्म तो सबकी सब प्रकार से रक्षा करने का ही आदेश देता है । धर्म निरपेक्ष का तातपर्य यही है कि सभी धर्मों का समन्वय करके किसी भी धर्म की निंदा न करते हुए दीनदुखियों को सुख देने ही सर्वोत्तम धर्म है ।
दुखया जनि कोई दुखिये,दुखिये अति दुख होय।
दुखया रोय पुकार है , सब गुड़ माटी होय।।
"सागर के बिखरे मोती"
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रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री"
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