Saturday, 4 February 2023

समाज कल्याण में रामस्नेही धर्म के आदि प्रवर्तक श्री दरियावजी महाराज की अहं भूमिका:-


समाज कल्याण में रामस्नेही धर्म के आदि प्रवर्तक श्री दरियावजी महाराज की अहं भूमिका:-

भारत माता अवतारों एवं ऋषि-मुनियों की पावन भूमि रही हैं। भारत में आध्यात्मवाद विश्व के अन्य देशों से कहीं अधिक हैं इसीलिए भारत देश विश्ववन्द्य और जगद्गुरू कहलाया । आदि काल से ही अवतारों और ऋषि-मुनियों ने भारतीयों के हृदय में आध्यात्मवाद और भक्ति की पावन धारा प्रवाहित की हैं। पौराणिक गाथाओं के अनुसार जगत जननी सीता पृथ्वी से तो महर्षि अगस्तय घट से उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार भगवान राम यज्ञ चरू की खीर से तो वैद्य धनवंतरी, लक्ष्मी, रम्भा आदि चौदह रत्न समुद्र से उत्पन्न हुए थे। ठीक इसी प्रकार रामस्नेही सम्प्रदाय के संस्थापक दरियाव महाराज भी पन्द्रहवें रत्न के रूप में दरिया (समुद्र) से उत्पन्न हुए थे।

जब राजपुताने में शाहजहां के पुत्र औरंगजेब के अत्याचार की सीमा चरम पर थी, हिन्दुओं का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। धर्म को बचाने की महत्ती आवश्यकता थी तब दरियाव महाराज ने अवतार लेकर धर्म को संरक्षण प्रदान किया। उनके अवतार की कहानी बड़ी रोचक हैं। पाली जिले के जैतारण कस्बे में मनसाराम-गीगाबाई नाम से एक धर्मनिष्ठ दम्पत्ति निवास करता था। उनके कोई सन्तान नहीं थी। उस समय भारत में धर्मद्रोह और अत्याचार का बोलबाला था। यह निःसन्तान दम्पति जोड़ा कहीं भी सुरक्षित स्थान न पाकर द्वारिका की और चल पड़ा। वहां पहुँचकर उन्होंने अनन्यभाव से भगवद् भक्ति की तथा धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए उन्होंने ईश्वर से पुत्र प्राप्ति की कामना की। भगवानके दरबार में भी जब उनकी प्रार्थना नहीं सुनी जा रही थी तो वो सांसारिक जीवन से पूरी तरह निराश होकर समुद्र में जल समाधि के लिए तत्पर हुए। भगवान को शायद उनके मानस की ऐसी ही स्थिति की प्रतिक्षा थी।

जल समिधि ग्रहण करने के लिए समुद्र की गहराई में उतरते समय उन्हें दिव्यवाणी सुनाई दी, " तुम्हारी मनोकामनाएँ अवश्य पूर्ण होंगी। कल प्रातः ब्रहम मुहूत में इसी दरिया की लहरों पर कमल पुष्प में तैरती बाल विभूति प्राप्त होगी। ईश्वरीय विभूति द्वारा जगत में चारों और तुम्हारी कीर्ति फैलेगी। उस बालक द्वारा जगत के कल्याण हेतु कार्य होंगे। ”

यह दिव्य वरदान पाकर दम्पति ने जल समाधि का विचार त्याग दिया। अगले दिन ब्रह्म मुहूत में वे विस्मित भाव से अथाह दरिया की लहरों पर कमल पुष्प में विद्युत चमक -सी आभायुक्त एक बालमूर्ति उन्हें तैरती दिखाई दी। निःसंतान दम्पति ने तत्परता के साथ बालक को उठा- कर हृदय से लगा लिया। वात्सलय से विभोर दम्पति को कुछ पल तो पुत्र प्राप्ति की अगाध प्रसन्नता हुई लेकिन ततकालीन अत्याचारपूर्ण परिस्थिति का पुनः ध्यान आते ही उनके लिए बालक को सुरक्षित रखना एक समस्या बन गई। उस दम्पति ने सांसारिक जीवन से विरक्त होकर पुनः समुद्र की गहराईयों में उतरने लगे तभी उन्हे फिर से दिव्य वाणी सुनाई दी- " बाल विभूति को लेकर तुरन्त स्वदेश लौट जाओ। यह बालक डूबते धर्म की रक्षा करेगा "। यह दिव्य वरदान पाकर जलसमाधी का विचार त्याग मनसाराम गीगाबाई तुरन्त स्वदेश जैतारण लौट आए। इस प्रकार विक्रम संवत् 1733 भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी के दिन निःसन्तान दम्पति को 'दरिया' से अमूल्य बाल निधि प्राप्त हुई, इसलिए बालक नाम 'दरियाव' रखा गया। वरदान के अनुसार, बालक दरियाव की अलौकिक शक्तियाँ उसके ननिहाल में रेणवासियों को उनकी बाल कीड़ाओं में दृष्टिगोचर होने लगी। एक बार की घटना हैं कि बालक दरियाव अपने बाल सखाओं के साथ खेल रहा था। तभी काशी के दो पण्डित रेण से होते हुए तत्कालीन जोधपुर नरेश से मिलने जा रहे थे। उनकी दृष्टि अन्य बालकों के संग खेल रहे बाल दरियाव पर पड़ी। वे बालक के तेजस्वरूप से अति प्रभावित हुए। पण्डितों ने गीगाबाई से इस तेजस्वी बालक को अपने साथ काशी ले जाकर सुशिक्षित करने की अनुमति चाही, जो उन्हें सहज ही मिल गई । इस प्रकार “गुरू गृह पढ़न को गए रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई। " सिद्धान्त को चरितार्थ करते हुए थोड़े ही समय में व्याकरण, वेद, गीता, उपनिषद एवं सभी दर्शन- शास्त्रों का अध्यन कर दरियाव रेण लौट आए। अब उन्हें सद्गुरू की प्राप्ति के बारे में वह सोचते रहते । आखिर विक्रम संवत् 1769 में उनकी प्रेमदास महाराज से भेंट हुई। विक्रम संवत् 1769 कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रेमदास महाराज ने दरियाव महाराज को अपना शिष्य स्वीकार कर आशीर्वाद प्रादान किया ।

दरियाव महाराज महाराज बाल्यावस्था में ही अपने ननिहाल रेण आ गए जहां उनका लालन-पालन खत्री समाज में हुआ। उन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की आधारशिला रखी। वे राम- धुन लगाय करते थे। रेण को ही उन्होंने तपःस्थली बनाया। कस्बे के लाखासागर के तट पर ईंटो से निर्मित चबुतरे पर विराजमान होकर वे तपसवा किया करते थे। कहा जाता है कि इस एकांत वन में लक्ष्मीजी, ब्रह्माजी, शिव, सनकादि, नारद जैसे देवादिदेव देवलोक से आकर दरियावजी महाराज से मिलते थे। अपने अनुयायियों को वे सदैव आदर्शो और सत्य आचारणों पर चलने के लिए उपदेश देते रहते थे। अनके अवतारित होने के समय भारत वर्ष में कर्मकाण्ड की कठोरता, बहुदेवापासना, आर्थिक विषमता, ऊँच-नीच का भेदभाव आदि अनेक कुप्रथाएँ एवं अत्याचार चरम पर थे। यहां के तात्कालिक शासक ( नरेश ) भी अपनी स्वर्ग से महान जन्मभूमि के गौरव को भूल चुके थे। विदेशी आक्रमणकारियों ने भी यहां के शासकों की फूट का लाभ उठाकार प्रजा का बलपूर्वक धर्म परिवर्तन करना शुरू कर दिया था। भारतीय समाज में सदियों से संस्कारित धार्मिक वर्चस्व के गढ़ भी धराशायी होने लगे। जनता भी अपने आप में असहाय महसूस करने लगी, ऐसे में दरियावजी ने धर्म पथ प्रदर्शित किया । उन्होंने पूर्ववर्ती संत कबीर, दादूदयाल आदि की भांतिनिर्गुण 'रामभक्ति' का प्रचार किया। उन्होंने जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं माना। जीव मात्र में उन्होंने ब्रह्म की उपस्थिति का आभास किया।


अपनी कठोर साधना के कारण उन्होंने परमात्मा का आत्म साक्षात्कार किया। दरियाव महाराज ने 'नाम' उच्चारण को बड़ा महत्व दिया। उन्होंने ब्रह्म के प्रचलित अनेक नामों में से “राम” नाम को स्वीकार किया। इसके पीछे कारण यह था कि 'राम-नाम' को शिक्षित एवं अशिक्षित सभी लोग आसानी से उच्चारित कर सकते हैं। उन्होंने योग बल पर आत्म तत्व को परमात्म तत्व में विलीन करते हुए परमात्मा के संग तादात्म्य भाव स्थापित कर स्वानुभूति का वर्णन अपनी वाणी में प्रधानता के साथ किया है। उनकी ज्ञान रूपी ज्योति और आध्यात्म सत्ता तीनों लोकों में व्याप्त हैं। वे अपने तपोबल से अत्याचारियों एवं दुष्टों का हृदय परिवर्तित कर उनमें क्षमा, दया और करूणा की निर्मल धारा प्रवाहित कर हिंसा, अन्याय, अत्याचार, आदि की मनोवृत्ति को बदलने में समर्थ थें । यही कारण था कि उनके समक्ष बैठी शेरनी हिरनी को चाहती थी तो चूहा फूदक कर सांप के फन पर निर्भय होकर बैठ जाता था। उन्होंने अपने अपने तपोबल से कोटि-कोटि जीवों का उद्धार किया। ज्ञान, भक्ति व योग की त्रिवेणी की पुनीत निर्मल धारा ऊर्जा शक्ति के रूप में प्रवाहित होने के कारण उनके तपोस्थल चबूतरे की ईटे आज कलयुग में पानी पर तैरती हैं। रामस्नेही भक्त तो उन्हें समुद्र से प्राप्त 15 वाँ रत्न मानते हैं। दरियाव महाराज का "वाणी सहित्य" तो रामसेहियों के लिए संजीवनी ही हैं। उनकी वाणी में सत्संग के प्रभाव एवं सद्गुरू की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया हैं।

दरियाव महाराज ने अपनी अलौकिक लीलाओं से जगत को चकित कर दिया। शिकारी द्वारा मारे गए मृग को जिंदा करना, कुओं के खारे जल को मीठा कर देना, भक्त उदयगिरि की पुकार पर लुटेरों से उसकी रक्षा करना आदि उनके अनेक पर्चे चर्चित है। यहीं नहीं, अनके तपस्थल चबूतरे की ईटे आज कलयुग में भी पानी पर तैरना उनकी आध्यात्म शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इन ईटो को वर्ष में तीन बार चैत्र, भद्रपद व मार्गशीर्ष की पूर्णिमा तिथि को सार्वजनिक रूप से हजारो श्रद्धालुओं की उपस्थिति में लाखासागर में तैरायी जाती हैं।

रेण स्थित रामधाम में दरियाव महाराज की पावन समाधि स्थित है। अखिल भारतीय रामनेही सम्प्रदाय की रेण पीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर आचार्य हरिनारायण शास्त्री ने रामधाम में भक्तों एवं श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए सैकड़ों कमरों का निर्माण कराया हैं। सत्संग हेतु पांच हजार लोगों के बैठाने की क्षमता वाले विशाल एवं अद्भुत सत्संग भवन का निर्माण कराया हैं। इसी प्रकार संगमरमर का सिंह द्वारा बनाया गया हैं। वहीं भीतरी द्वार का संगमरमर निर्माण जारी हैं। उन्होंने रामधाम का तो कायाकल्प किया ही हैं वे भारत भ्रमण कर सत्संग के माध्यम से भक्तों को आत्मकल्याण हेतु उपदेश प्रसारित कर रहे हैं।

Thursday, 2 February 2023

जहां पत्थर(ईंट), पानी पर तैरते है

जहां पत्थर(ईंट), पानी पर तैरते है

बाल्मिकी रामायण और राम चरित मानस में सबसे बड़ा चमत्कार यदि कोई है तो वह है रामेश्वर से लंका तक समुद्र पर पत्थरों के पुल का निर्माण शास्त्र साक्षी हैं कि नल और नील जैसे वानर इंजिनियरों की देख रेख में असंख्य वानर, भालू आदि ने बड़े-बड़े पत्थरों पर राम नाम लिखकर समुद्र में फैकते और वे समुद्र के पानी की सतह पर कागज की तरह जैसे तैरते थे। इस तरह चमत्कारिक ढंग से एक जबर्दस्त पुल का निर्माण हो गया था।

करोड़ो,लाखो वर्ष पुरानी इस घटना का मात्र रामायण के अन्य कोई साक्षी या साक्ष्य नहीं हैं। आज के वैज्ञानिक रामायण काल की उस घटना को हास्यापद, मजाक व झूठ की सीमा से भी बड़ा झूठ कहते हैं। वे सवाल करते है कि यदि राम के नाम से उस युग में पत्थर तैरते थे तो अभी क्यों नहीं तैरते? अपने स्थान पर सही है क्योकि पत्थर तैरते या तैराते किसी ने अपनी आंखों से नहीं देखा ।

राजस्थान सती-जती और सूरमाओं की जगह हैं। यहां वह सभी घटता है जो आश्चर्य- जनक हैं। अनेक बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, विचारक, चिन्तक और दार्शनिक इस करिश्में को देखकर सोचने पर बाध्य है। जब राम नाम के पत्थर पानी पर तैरते दिखाए जाऐं।

राजस्थान के नागौर जिले के रेण नामक गांव में संत दरियावजी महाराज पीठ राम- धाम हैं। इस रामधाम में मिट्टी से निर्मित पकाई हुई चार ईटें विद्यमान है। ये चारों ईटें आज भी पानी पर तैरती है और वर्ष में तीन बार सार्वजनिक रूप से तैराई जाती है। एक बड़ी ईट लगभग ढाई किलो वजन की है, यह लगभग १० इंच लम्बी ८ इंच चौड़ी और ३ इंच मोटाई में हैं। इस बड़ी ईट सहित शेष सभी ईटें तालाब में पानी पर ऐसे तैरती हैं जैसे कागज की बनी ईटें हो।

दरियावजी ने एक स्वतंत्र रामस्नेही संप्रदाय की आधारशिला रखी और वे रामधुन लगाया करते थे। दरियावजी महाराज के बादउनके उत्तराधिकारी गद्दीनशीन क्रमशः हरखारामजी, रामकरणजी, भगवतदासजी व रामगोपाल महाराज हुए।

ये सभी संत पक्की ईटों के एक चबूतरे पर स्नान किया करते थे। रामगोपालजी के परलोक गमन के बाद उस ईटों के चबतूरे को हटाकर स्नान का नया स्थान बनाया गया तब | ईटें तालाब के पानी में फिंकवा दी गई।

आश्चर्य तो तब हुआ जब ईटें पानी में डूबने के बजाय तैरने लग गई। उस समय महन्त क्षमारामजी ने इन ईटों को सहेज कर सुरक्षित रखा और विभिन्न अवसरों पर इन ईटों को तैराना प्रदर्शित करना आरम्भ कर दिया ।

जब पानी पर ईटें तैरने का समाचार आग की तरह पूरे मारवाड़ में फैला तो तात्कालीन मारवाड़ के महाराज सर उम्मेदसिंह ने एवं ब्रिटिश सरकार के एजेंट ने जो आबू में रहता था, इसे लोगों को बेवकूफ व मूर्ख बनाने वाला जालमाजी का कार्य मानकर स्वयं अपने सामने ईटें तैराने का आदेश दिया। तात्कालीन महन्त क्षमारामजी महाराज ने राम का नाम लेकर एक ईंट नहीं बल्कि सभी ईटें पानी में जोर से फेंक दी। देखते ही देखते ही देखते ईटें पानी की सतह पर आ गई और तैरने लग गई।,

इस चमत्कार से महाराज और एजेंट प्रभावित हुए और अग्रेंज को इस ईट में किसी प्रकार की जालसाजी का शक था। एक ईट उसने रख ली और इग्लैड में जांच के लिए भेज दी। इगलैड के वैज्ञानिकों की इस रिपोर्ट ने तो उसे और भी अधिक शर्मिंदा कर दिया कि यह ईट पत्थर की है। इनका तैराना प्रकृति के विपरीत हैं। नियमानुसार इस घटना से अग्रेज एजेंट प्रभावित हुआ और महाराज की प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सके।

जोधपुर राजघराने पर रामस्नेही सम्प्रदाय का प्रभाव और भी अधिक हो गया। रेण में क्षमारामजी के स्वर्गवास के बाद उनके उत्तराधिकारी बलरामदासजी शास्त्री हुए जिन्होंने गद्दी का परित्याग कर अपने योग्य शिष्य हरिनारायणजी शास्त्री को गद्दीनशीन किया। आप के ब्रह्मलीन होने पर सज्जनराम जी महाराज विराजमान हुए।

 वर्ष में तीन बार इन ईटों को तलाब में सार्वजनिक तौर पर चैत्र, भाद्रपद, मार्ग शर्ष की पूर्णिमा को हजारों दर्शनार्थियों के समक्ष लाखासागर तालाब में तैराते है जिसे देखकर दर्शनार्थी भक्तगण आनन्द से अभिभूत हो उठते हैं।

Wednesday, 4 January 2023

गुरुकृपा सन्देश ।। सत्संग के सूत्र ।। आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज के सत्संग से

जीव और परमात्मा के बीच जो दूरी है वह कई जन्मो से है, कई कल्पो से है , सतगुरू हमे मंत्र बताकर उपासना बताकर वह दूरी मिटाते है।

ईश्वर का महाप्रसाद है मानव जीवन।

बिना गुरू के कर्म नही कट सकते हैं।

मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है।

राम नाम से ही आत्मा का पोषण होता है। 

प्राणिमात्र में परमात्मा को देखना चाहिए।

हमारी चिन्तनधारा आध्यात्मिकता की ओर होनी चाहिए।

भगवान का परिचय सतगुरू देते हैं।

राम नाम स्मरण से करोड़ों पाप कर्म जलकर नष्ट हो जाते हैं।

संतो के संग से मानव का कल्याण होता है। 

कलियुग में राम नाम जाप को मुक्तिदाता माना गया है।

राम नाम रुपी औषधि से ही मन के विकारों पर विजय पाई जा सकती है।

राम नाम जाप भगवत् प्राप्ति का सरलतम उपाय है।

नम्रता और परमार्थ के साथ जीवन जीना चाहिए।

निष्काम भाव से की जाने वाली सद्गुरू की सेवा और साधना से भगवान भक्त के वश में हो जाते हैं। भगवान स्वयं साधक के आगे झुककर सेवक बन जाते हैं।

ह्रदय मे बैठे शत्रु को मारे , वो ही शूरवीर है।

राम नाम का निरंतर स्मरण करते रहने से जीवन में आध्यात्मिकता आती है।

गुरू जैसा दूसरा कोई उपकारी नहीं हो सकता।

राम नाम के संकिर्तन में सब समस्याओं का समाधान भरा है।

जिस शरीर से भजन नही हो रहा वो कुडा घर की तरह है।

राम शब्द में कोटि कोटि ब्रम्हान्ड समाया हुआ है।

 जो व्यक्ति हमेशा राम का चिंतन करता है भगवान उसको संभालते है।

डीमांड(मांग) भगवान की करनी चाहिए संसार की नही।

जीभ पे लगा हुआ घाव जल्दी भर जाता है परंतु जीभ से दिया घाव जीन्दगी भर नही भरता , इसलिए जीभ का संभलकर उपयोग करना चाहिए।

दुखो के सागर में सद्गुरू ही व्यक्ति के साथ खडे़ रहकर शिष्य को भवसागर पार उतारते हैं।

सद्गुरू की शरण में जाने से व्यक्ति के जीवन में अलौकिक क्रान्ति आती है।

ये मानव तन हमे मिला है जिससे मनुष्य नर से नारायण बन जाता है। हमे इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।

सारे शास्त्रो का सार भगवत नाम स्मरण है।

आशा परम दुःख का कारण है निराशा परम सुख का कारण है ईश्वर को छोडकर और किसी से आशा नही करनी चाहिए।

राम नाम स्मरण से करोडो़ं पाप कर्म जलकर नष्ट हो जाते हैं।

जो व्यक्ति भगवान के नाम में विश्वास करता है, वह अवश्य ही जीवन में सफलता अर्जित करता है।

हमे भजन करके अंतकरण को पवित्र करना चाहिए। अंतकरण पवित्र होंगा तभी परमात्मा हमारे अंदर निवास करेंगे।

राम कृपा को आसरो, राम कृपा को जोर ।
राम बिना दिखे नहीं, तीन लोक में ओर।।

शरीर को मै मानना सबसे बडा अपराध हैं।

ज्ञान सर्वत्र है उसे लेने के लिए पात्रता होनी चाहिए।

ह्रदय में बैठे शत्रु को परास्त करना मुश्किल है। लेकिन गुरू की कृपा से ही ये संभव है

जीवन मे सतगुरु ही आधार हैं।

अनंत कोटि ब्रम्हान्डनायक परमात्मा की प्राप्ति कराने में सच्चे सहायक केवल सतगुरू ही है।

गुरू के अंतःकरण से निकला हुआ शब्द ही 'गुरू' का स्वरूप है।

आध्यात्मिकता से जुड़े बिना सारा जीवन व्यर्थ होगा।

धनवान तो वही है जो रामनाम का धन संग्रह करता है।

राम राम रटते रहो तो परिणाम अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

सच्चे विश्वास के साथ जो सतगुरू के चरणों का आश्रय ले लेता है उसका कल्याण निश्चित है।

गुरू वही है जो स्वयं तिरता है और दूसरो को भी तारता है।

सतगुरू की महिमा इसीलिए है की हम उनसे उपकृत हैं तथा उनका ऋण हम उतार नही सकते।

अन्तर्यामी भगवान सत्य संकल्प को अवश्य पूरा करते हैं।

सत्संग एंव सतगुरु ही जीवन के सही मार्गदर्शक हैं।

जो शिष्य गुरू कि गर्जना को सहन करता है वो परम पद प्राप्त करता है।

सतगुरू शिष्य को ऐसा अक्षय दान देते है, जिसका कभी विनाश नहीं होता है तथा जिसके द्वारा शिष्य सदा ही आनंद मे गोता लगाता रहता है।

जीवन ऐसा बनाना चाहिए जिसे देखकर प्रत्येक व्यक्ति आकर्षित हो।

सतगुरू के शब्द रूपी जल को ह्रदय में बनाए रखने से शिष्य की जन्म जन्मांतरों की प्यास बुझ जाती है।

सतगुरू का स्वरूप छोटा सा दिखता है परन्तु उनके अन्दर महान आध्यात्मिक धन भरा रहता हैं।

भगवदनाम (रामनाम) रूपी चिंतामणि के द्वारा आत्मा को जानना ही मानव जीवन की उपयोगिता है।

हम सब परमात्मा की संतान है।

संसार परिवर्तनशील है।

अहंता ओर ममता ही सब दुखो की मूल है।

 ईश्वर से अपना संबंध पहचानो और लोगों से ईश्वर के नाते व्यवहार करो तो इसी जन्म में कल्याण हो जायेगा ।

जो अपने मन के दोष निकालने के लिए तत्पर रहता है वह इसी जन्म में निर्दोष नारायण का प्रसाद (आत्मसाक्षात्कार) पाने का अधिकारी हो जाता है ।

गुरु की वाणी को निर्णायक होकर नही,निष्ठावान होकर सुनना चाहिए।

सत्संग मानवता का निर्माण करती है।

वर्तमान का सदुपयोग ही भूत और भविष्य की चिंता मिटा देता है।

ईश्वर स्मरण करने वाला साधक ही इस मृत्यु के जाल से बच सकता है।

नाशवान शरीर की सुंदरता का अभिमान ने करके शरीर के द्वारा राम भजन व सत्संग करना ही शरीर की उपयोगिता है।

Friday, 30 December 2022

रेण रामस्नेही आचार्य परम्परा :-

 रेण रामस्नेही आचार्य परम्परा :-
  1. रेण रामस्नेही सम्प्रदाय के आदि प्रर्वतक श्री श्री 1008 आचार्य श्री दरियाव जी महाराज का प्राकट्य - वि.सं. 1733 भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी तथा महानिर्वाण वि.स. 1815, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को। 
  2. आचार्य श्री हरखाराम जी महाराज प्राकट्य वि.सं. 1803, भाद्र पद कृष्ण द्वादशी तथा महा निर्वाण वि.स. 1861, भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी को। 
  3. आचार्य श्री रामकरण जी महाराज (आपने 77 वर्ष तक गादी पर विराजमान होकर संत सेवा की थी ) प्राकट्य वि.सं. 1736, भाद्र पद शुक्ला चतुर्दशी को तथा निर्वाण तीथी ज्ञात नहीं हैं, 
  4. आचार्य श्री भगवद्दास जी महाराज प्राकट्य वि.स. 1917, चैत्र कृष्णा तृतीया तथा महानिर्वाण वि.सo 1859, कार्तिक कृष्ण का एकादशी को । 
  5. आचार्य श्री रामगोपाल जी महाराज - पदासीन वि.स. 1959, कार्तिक सुद्धीपूर्णिमा तथा ब्रह्मलीन वि.सं. 1998, फाल्गुन शुक्ला, प्रतिपदा को । 
  6. आचार्य श्री क्षमारामजी महाराज- प्राकट्य वि.सं. 1940, भाद्रपद कृष्णाष्टमी व गादी आसीन वि. सम्वत् 1998, चैत्र शुक्ला तृतीया तथा ब्रह्मलीन वि.सं. 2029 पौष कृष्णा तृतीया शनिवार को। 
  7. आचार्य श्री बलरामदास जी महाराज ने केवल पांच मिनट गादी स्वीकार की और अपने शिष्य श्री हरिनारायण जी महाराज को गादी प्रदान कर दी। प्राकट्य वि.स. 1994, मिंगसर सुद्धि एकादशी व गादी स्वीकार्यं दिन वि.सं. 2029, पोष शुक्ला चतुर्थी तथा ब्रह्मलीन वि.सं. 2036, पौष कृष्णा अष्टमी को। 
  8. आचार्य हरिनारायण जी महाराज वि.सं. 2004 जन्माष्टमी भादवा में 21 अगस्त, 1947 में व पदासीन वि.सं. 2029 पौषशुक्ला चतुर्थी से 08.06.2021 जेष्ठ कृष्ण त्रयोदशी विक्रम सम्वत 2078।
 
(नोट :- तृतीय आचार्य श्री रामकरण जी महाराज के बाद रेण रामस्नेही गादी कुछवर्षों तक रिक्त रही थी। )


Friday, 16 December 2022

जीवन चरित्र:- स्वामी श्री बलरामदासजी महाराज

॥ श्री राम ।। 

जीवन चरित्र:- स्वामी श्री बलरामदासजी महाराज

संसार में समय समय पर लोकोत्तर महापुरुषों का आविर्भाव होता रहता है । कोई जाति, कोई धर्म, कोई देश, कोई काल, ऐसा नहीं है जिसमें ऐसे महापुरुषों का आविर्भाव नहीं हुआ हो। प्राचीन काल से लेकर आज तक के काल में न मालूम कितने वैभवशाली आदर्श महापुरुष अवतीर्ण हो चुके ! न मालूम भविष्य में और कितने होंगे ।

मानव समुदाय का जो कुछ महत्त्व आज है या भविष्य में रहेगा ! वह ऐसे ही महान् पुरुषों के पुरुषार्थं का फल है । ऐसे महापुरुषों की गिनती में परम पूज्य भूतपूर्व आचार्य श्री शास्त्री बलरामदास जी महाराज थे । पूज्य श्री शास्त्री जी महाराज का जन्म विक्रम सं. १६६४ मिगंसर सुदि एकादशी को ग्राम असावरी जिला नागौर पवित्र दाधीच ब्राह्मण कुल में हुआ | आपके माता का नाम जमुनाबाई एवं पिता का नाम श्री जयदेव जी हैं। जब आप बाल्यावस्था में थे, उस समय आपका शरीर शान्त हो गया था, और मृत शरीर को स्मशान में ले जाया जा रहा था। घर वालों की रोने की आवाज सुन-कर रेण सम्प्रदाय के संत श्री गुलाबदास जी महाराज ने जीवन दान देकर के रेण में दीक्षित होने की प्रेरणा दी। इन्हीं महात्मा की दिव्य प्रेरणा से सात वर्ष की अवस्था में आचार्य श्री क्षमारामजी महाराज से वि० सं० २००१ में गुरु दीक्षा प्राप्त की । आप बाल्यकाल से ही विद्या अध्ययन में रूचि रखते थे, विद्या अध्ययन में दक्षता देख के आचार्य श्री क्षमारामजी महाराज ने झोंकर थम्बा के साधु आनन्दरामजी के संकेत से आपको विद्याध्ययन के लिये आकोला भेज दिया । आकोला में राधाकृष्ण तोषनीवाल पाठशाला में संस्कृत लघु- सिद्धान्तकौमुदी आदि ग्रन्थों का अध्ययन तीन वर्ष तक करके श्री सीताराम पारिक संस्कृत विद्यालय, इन्दौर में (म.प्र.) संस्कृत के आदर्श ग्रन्थों का अध्ययन करने के पश्चात् विश्वनाथ की महान् नगरी वाराणसी में स्थित विश्व विख्यात संस्कृत विश्व विद्यालय के अन्तर्गत ढूंढीराज गली में संस्कृत सन्यासी डिग्री कालेज में आपने दर्शन, न्याय, मीमांसा, ज्योतिष आदि ग्रन्थों का अध्ययन करके व्याकरणाचार्य उपाधी प्राप्त की । तदनन्तर आप आचार्य पीठ रामधाम रेण पधार गये । आचार्य श्री क्षमाराम जी महाराज के वर्तमान समय में आप रेण आचार्य पीठ के उत्तराधिकारी बनकर भारत की पथ भ्रष्ट जनता को आपने उपदेश- आदेश, मधुर एवं आकर्षक वाणी द्वारा जाग्रत किया । आपमें स्वभावतः त्याग एवं उदारता की भावना थी, तथा आप भगवत् भक्ति में लीन रहते थे । कभी-कभी वैराग्य के आवेश में आकर रामधाम को छोडकर पुष्कर एवं जोधपुर के पहाड़ों में साधना हेतु पधार जाते थे । परन्तु आचार्य श्री क्षमाराम जी महाराज के वृद्ध अवस्था की स्मृति व सम्प्रदाय का उत्तरदायित्त्व का विचार जकजोर देता था । अतः पुनः रामधाम रेण में पधार जाते थे । आपके जीवन में इस प्रकार की घटनाएँ अनेक बार हुई पश्चात् आपने रामधाम रेण में बिराजकर सन्त साहित्य का पिछडा हुआ क्षेत्र आगे लिया । आचार्य श्री क्षमाराम जी महाराज के परम धाम पधारने के बाद में अत्यन्त वैराग्य के कारण पहले से ही आचार्य पद पर न रहने की प्रतीज्ञा कर ली थी परन्तु साधु समाज एवं ग्रहस्थ समाज के अति आग्रह व आचार्य परम्परा का विधान पालन करने के लिये पाँच मिनिट आचार्य पीठ को स्वीकार करके गादी पर बिराजमान हुये थे । तदनन्तर तुरन्त ही गादी का त्याग कर पूज्य गुरुदेव ने विक्रम संवत् २०२६ पोष शुक्ला चतुर्थी के दिन आचार्य पीठ को मेरे सुपुर्द कर दिया।
पश्चात् आपने परम् श्रद्धेय श्री स्वामीजी रामसुखदास जी महाराज के साथ रहकर व्यापक धर्म प्रचार किया। कुछ महिनों तक आपने गीता प्रेस गोरखपुर संस्था की सेवा की । आपके त्याग, तपस्या, सरलता, आदि देवी सम्पदा के कारण स्वाभाविक ही भूली भटकी जनता आपके शब्दों का अनुकरण कर आध्यात्मिक लाभ उठाती रही। इस प्रकार आपने भारत के कोने कोने में परिभ्रमण कर हजारो जीवों को सत्संग द्वारा भगवत्प्राप्ति का मार्ग प्रदर्शित किया। ऐसे महान् पुरुषों की देश को बड़ी आवश्यकता है, किन्तु विधि के विधान को कौन परिवर्तन कर सकता है। विक्रम संवत् २०३६ पौष कृष्णा प्रथम अष्टमी मंगलवार को वियोग के दुःख का दिन आया और शरणागत सभी जीवों को अनाथ कर- "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः'
का उपदेश करते हुए पूज्य गुरुदेव इहलौकिक लीला समाप्त कर सत्य लोक कैवल्यधाम पधार गये । आपका चरित्र व्यवहारिक वाणी को अगोचर है अतः मेरे तुच्छ वाणी द्वारा आपके चरित्र का वर्णन करना असंभव है ।

श्रीगुरुचरणानुरागी 
हरिनारायण शास्त्री

Wednesday, 14 December 2022

श्रीमद्दरियावजी महाराज का संक्षिप्त जीवन चरित्र

श्रीमद्दरियावजी महाराज:-

 प्राकट्य :- श्रीमद्दरियाव जी महाराज का प्राकट्य वि.सं. 1733, भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी को हुआ था। आपका प्राकट्य ऐसे समय में हुआ था, जब इस भारत देश पर मुगलों का अत्याचार हो रहा था। जबरन हिन्दुओं को मुसलमान बनाया जा रहा था और जो मुसलमान नहीं बनते थे उन पर "जजिया कर लगाया जाता था। हिन्दुओं के धार्मिक स्थान नष्ट-भ्रष्ट किये जाते थे। साधु महात्माओं को कठोर ताड़ना दी जाती थी। ऐसे विकट परिस्थिति में मानस की वह चौपाईयां स्मरण हो आती हैं कि 
 "जब-जब होड़ धरम के हानी। बाढ़हि असुर अधम अभियानी ।। 
 करहि अनिती जाइ नहिं बरनी। सींदहि विप्र धेनु सुर धरनी।।
  तब-तब प्रभु धरहि विविध शरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।" 
 
ऐसे समय में डूबते हुए के लिए सहारा रूप श्रीमद्दरियाव जी महाराज का प्राकट्य हुआ था कि राजस्थान के पाली जिला के जैतारण तहसील में अनेक कुलीन हिन्दु जातीयाँ रहती थी, उन्हें भी जबरन तुर्क बनाने के पूरे प्रयास किये जाते थे और कई हिन्दुओं को मुसलमान बना दिया गया था। इसी घटनाक्रम के अनुसार धर्मनिष्ठ श्री मनसारम जी खत्री (वैश्य) व उनकी धर्म पत्नी श्रीमती गीगा बाई पर भी यवन होने का दबाव डाला गया था। आप दोनों ही पति-पत्नि बड़े ही धर्म निष्ठ थे, आपके कोई संतान नहीं थी। आपने मुसलमान बनने की अपेक्षा जैतारण का त्याग कर श्री वासुदेव भगवान की शरण में श्री द्वारिका जाना ही सर्वश्रेष्ठ समझा था। द्वारिका पहुँचकर आपने अपना सारा दुःखड़ा भगवान श्री द्वारिकाधीश जी के सामने प्रकट कर दिया था। एक तो घर में सन्तान नहीं थी और दूसरी घर से बाहर तुकों का बेरहमी अत्याचार था। अतः सब तरह से सर्वत्याग करके दोनों ही दम्पति भगवद् भजन में तल्लीन हो गये थे। उन दोनों के मन में सुक्ष्म फुरणा यह थी कि भगवान हमें ऐसी संतान दे कि वह हिन्दु धर्म व संस्कृति की रक्षा कर सके। ये दोनों ही पति-पत्नि कुछ महिनों तक भगवान से प्रार्थना करते थे और ध्यान भजन भी करते थे किन्तु जब उन्हें लगा कि भगवान के दरबार में उनकी प्रार्थना नहीं सुनी जा रही हैं, तब पूरी तरह से निराश होकर जल समाधि लने के लिए तत्पर हो गए थे। वे ज्यूँ ही जल समाधि लेने के लिए दरिया (सागर) के पास गये तो, उन्हें आकाशवाणी सुनाई पड़ी कि " शान्ति शान्ति शान्ति" । चकित दम्पति ने चारों ओर निहारा, उन्हें समुद्र की लहरों पर कमल पुष्प के ऊपर आकाश विद्युत सी आभायुक्त एक बालमूर्ति दुष्टिगोचर हुई। पति-पत्नि विस्मित व विह्वल होकर उस बाल स्वरूप की ओर दौड़ पड़े तथा उसे उठाकर अपने हृदय से लगा लिया था। बाल वात्सल्य के प्रेम में माता गीगा बाई जी तो अपनी सुध बुध ही खो बैठी। उनके ममत्व भरे स्तनों से दुग्ध की धारा प्रवाहित हो चली थी। देश की तत्कालीन दशा को पति-पत्नि थोड़ी देर के लिए भूल ही गए थे, किन्तु थोड़ी ही देर बाद ज्यूँ ही वे भौतिक चेतना में लौटे, तो उनके सामने देश में व्याप्त तत्कालीन अत्याचार पूर्ण परिस्थितियों ने उन्हें घर लिया था। वे सोचने लगे कि ईश्वर की कृपा से हमें बालक तो प्राप्त हो गया है किन्तु इसे कहाँ और कैसे सुरक्षित रखा जाय ? इसको पालने पोचने के लिए मारवाड़ तो जाना ही होगा, किन्तु वहाँ तो अत्याचार हो रहे है। ये पुनः अपनी विवशताओं के घेरे में लौट आए थे उन्होंने तय कर लिया कि ऐसी परिस्थितियों में जल समाधि ही लेना ठीक है वे कुछ समय के लिए बालक के स्नेहभाव से विरोहित होकर जल में समाधि के लिए प्रवेश कर ही रहे थे कि उसी समय पुनः आकाशवाणी हुई कि "आप बालक को लेकर स्वदेश लौट जाओ। ये ईश्वरीय प्रसाद आपके लिए मंगलदायी होगा संसार में इस बालक के द्वारा आपकी कीर्ति फैलेगी। इस बालक के द्वारा विश्वकल्याणकारी कार्य होंगे।"इस आकाशवाणी को सुनकर श्रीमनसारामजी खत्री व श्री गीगाबाईजी बालक को अपने साथ लेकर मारवाड़ जैतारण को आ गये थे। बालक का नाम दरियाव रखा था क्योंकि दरिया (सागर) से प्राप्त हुए थे इसीलिए सभी लोग बालक को दरियाव के नाम से पुकारने लगे। श्री दरियाव जी द्वितीया के चाँद की तरह बड़े होने लगे तो एक दिन माता गीगाबाईजी दरियाव जी को पालने में सुलाकर जल भरने के लिए तालाब पर गई थी। उनके जाने के कुछ देर बाद बालक के मुँह पर कुछ धूप आ गई। थोड़ी ही देर में बालक के शरीर पर धूप छा गई थी। अतः बालक की काया व मुँह को धूप की चिलाहट से बचाने के लिए ईश्वरीय प्रेरणावश एक नाग देवता कहीं से उत्तर आए और अपना फन फैलाकर बालक के ऊपर छायां करने लगे। जब माता गीगा बाई जी जल भरकर वापस आई तो बालक के ऊपर छायां किए नाग को देखकर हतप्रभ हो गई थी। थोड़ी ही देर में वह नाग चला गया। माता ने बालक दरियाव जी को गोदी में लिया और स्वस्थ देखकर प्रसन्न हुई। फिर बालक को लेकर माता पण्डित जी के पास बालक का भविष्य जानने के लिए गई। ज्योतिषी पण्डित ने अपने ज्योतिष ज्ञान के आधार पर बालक को अद्भुत महापुरूष बताया और भविष्यवाणी करते हुए कहा कि यह बालक आगे चलकर महापुरूष बनेगा। बहुत से दुःखी लोगों के कष्ट निवारण करेगा। दुनिया इन्हें पूजेगी।" ज्योतिष जी की भविष्यवाणी सिद्ध कि कुछ ही दिनों बाद बालक दरियाव जी महाराज अपनी बाल्य लीलाओं से सबको आनन्द विभोर करने लगे। आपका आकर्षण भगवान बालक कृष्ण की ही तरह था। आपके पिता रूई पीनने का काम करते थे। इसीलिए लोग इन्हें पीनाराजी भी कहते थे। जब से आपका पर्दापण घर में हुआ था, तब ही से आपके ऊपर आने वाली बाधाएँ दूर से ही टल जाती थी। यहाँ तक कि क्रूर हृदय वाले तुर्क भी आपके घर को देखकर ही बदल जाते थे और आप पर मेहरबान बन जाते थे। किन्तु आपके पोषक पिता श्री मनसाराम जी आपकी बाल लिलाओं का आनन्द मात्र सात साल ही ले सके अर्थात वि.सं. 1740 में उनका स्वर्गवास हो चुका था। तब माता गीगा बाई जी ने आपका पालन पोषण किया था।

श्रीदरियाव जी महाराज का रेण आगमन :- पति देव के परलोक गमन के बाद माता गीगा बाई जी ने सोचा कि अपने पीहर रेण में पिता श्री किशनजी के यहाँ जाना अच्छा रहेगा अतः वे अपने प्यारे पुत्र श्री दरियाव को लेकर रेण को आ गई थी। यह रेण ग्राम मेड़ता सीटि से पन्द्रह किलोमीटर दूर नागौर रोड़ पर उतर दिशा में हैं। रेण में अपने पिताजी के यहाँ माता श्री गीगाबाई जी अपना पुस्तैनी कार्य करती और रेण में ही रहने लगी थी। श्री किशन जी खत्री को भी मुसलमानों ने बलपूर्वक यवन बनाकर उनका नाम "कमीश यानि कमसेत जी" रख दिया था। किशनजी के कुछ अन्य परिजन भी मुसलमान बना दिये गये थे। श्री गीगा बाई जी के पीहर के लोग बालक दरियाव जी के प्राकट्य का वृतान्त सुनकर अति प्रसन्न हुए थे। कुछ ही समय बाद श्री दरियाव जी महाराज की अलौकिक शक्तिया रेण वासियों को दृष्टि गोचर होने लगी थी। सतगुरू कबीर साहेब व गुरुनानक जी की तरह इनके अलौकिक चमत्कारों से जनता प्रभावित होने लगी थी। एक बार आप बालकों के साथ खेल रहे थे, उसी समय काशी के दो पण्डित रेण से होकर गुजर रहे थे। ये पं. जोधपुर नरेश से मिलने के लिए जा रहे थे। उनकी दृष्टि अन्य बालकों के मध्य खेलते हुए बालक दरियाव जी पर पड़ी थी। वे बालक के आकर्षणी आभा मण्डल व ओजस्वी चेहरे को देखकर बहुत प्रभावित हुए थे। जैसे भगवान महादेव जी श्री रामजी के बाल रूप को देखकर चकित हुए थे, वे ही स्थिति इन पण्डितों की हो गयी थी। पण्डित जी माता गीगा बाईजी के पास गये और बालक को शिक्षित करने के लिए अपने साथ काशी ले जाने का प्रस्ताव रखा, तब माताजी ने बहुत सोच विचार कर अपने पिताजी की आज्ञा लेकर किशोर दरियावजी को उन पण्डितों के साथ काशीजी में शिक्षा पाने के लिए भेज दिया था। पण्डितों ने काशी जी में श्री दरियाव जी महाराज को शास्त्र अध्ययन कराना शुरू कर दिया था। कुशाग्र बुद्धि के धनी श्री दरियावजी ने थोड़े ही समय में पण्डितों द्वारा दी गई शिक्षा को अर्जित कर लिया था। आपने काशी निवास के दौरान - व्याकरण, वेद, श्रीमद्धभगवद गीता, श्रीमद् भागवत, उपनिषद तथा दर्शन शास्त्र व योग शास्त्र के सभी ग्रन्थों का अध्ययन कर लिया था। श्री दरियाव जी जैसे सुपात्र को शिक्षा देकर पण्डितों को बड़ा आनन्द आया और अपना जीवन सफल माना था।

सद्गुरु की प्राप्ति: काशीजी से विद्या प्राप्त कर आप सकुशल रेण पधार गये थे। एक दिन आप नित्य नियम के अनुसार श्रीमद भागवत जी का पाठ कर रहे थे कि - 
"रहुगणैः तत्तपसाः " आदि। इसी प्रसंग को पढ़ते समय आपकी दृष्टि गुरू महिमा पर अटक गई थी। श्री दरियाव जी महाराज को भीतर से प्रेरणा होने लगी कि -" अब मुझे सतगुरू धारण करना चाहिये।" इसी विचार में आप कुछ दिन तक खोये रहें। फिर आपने गुरू की खोज की, तब खटदर्शनीयों में कोई ऐसा महात्मा नहीं मिला जो आपको गुरू रूप में प्राप्त हो। आपने कई सन्यासी महात्माओं का भी दर्शनादि किये, परन्तु आत्मा ने गुरू धारण करने की स्वीकृति नहीं दी। किसी भी साधक का भाग्य, पुण्य, सुकृत आदि समर्थ सद्गुरू की ओर ही ले जाने की प्रेरणा करते है और यह सच भी है। कि- भाग्य के बिना समर्थ सद्गुरू नहीं मिलते है। कुछ दिन तक श्री दरियावजी महाराज की गुरू प्राप्ति करने की आकांक्षा बनी रही और आप कभी उदास हो जाते तो कभी विरह करने लगते । एक दिन स्वयं भगवान ने आपको प्रेरणा दी कि हे दरियाव! चिन्ता मत करो। अवश्य ही एक दिन प्रेम पुरूष जी आकर तुमको साधना का मार्ग प्रशस्त करेंगे।" उधर ब्रह्मज्ञानी महापुरूष श्री संतदास जी महाराज के शिष्य भजनानन्दी श्री प्रेमदास जी महाराज को भगवद प्रेरणा से यह संकल्प हुआ कि -' रेण नगर में जाकर महाभाग्यशाली साधकों को भजन करने का मार्ग प्रसस्त करों अतः भगवान का संकल्प सुनकर श्री प्रेमदास जी महाराज वि.सं. 1769 में भिक्षाटन करते हुए श्री दरियाव जी महाराज के निवास स्थान रेण में पधारे थें उन्होंने द्वार पर आकर बड़े ऊँचे स्वर से घोष किया कि -'रामराम'' रामनाम की रहस्यमयी ध्वनि श्री दरियाव जी महाराज के श्रवण से होती हुई हृदय तक प्रविष्ट कर गई। शीघ्र ही श्री दरियाव जी महाराज घर से बाहर निकल कर घरम तेजस्वी श्री प्रेमदास जी महाराज के श्री चरणों में गिर गए। श्री प्रेमदास जी महाराज ने उन्हें अपने हाथों से उठाया और धैर्य बन्धाया, तब दरियावजी महाराज ने आपका नाम सुनकर गुरू दीक्षा प्राप्त करने की प्रार्थना की थी। परम कृपालु संत श्री प्रेमदास जी महाराज ने दरियाव जी महाराज की जिज्ञासा को देखकर उन्हें गुरू मंत्र प्रदान किया और शीश पर हाथ रखकर भक्ति का आशीर्वाद दिया था। श्री दरियाव जी महाराज ने वि.स. 1769 कार्तिक शुक्ला एकादशी को गुरू दीक्षा प्राप्त की थी। गुरू दीक्षा प्राप्त करते ही श्री दरियाव जी महाराज के हृदय में राम-भक्ति का प्रवाह चलने लगा था, सुषुप्त शक्तियाँ जागृत हो गई थी। उसी दिन से श्री दरियाव जी महाराज ने अपना जीवन सनाथ (सफल ) माना था। यथा:-

" दरिया सतगुरु भेटिया, जां दिन जन्म सनाथ।
 श्रवणा शब्द सुनाय के, मस्तक दीना हाथ ।।" 
  सतगुरू प्रेमदास जी महाराज द्वारा गुरू दीक्षा प्राप्त कर श्री दरियाव जी महाराज ने राम नाम की तीव्र साधना करना आरम्भ कर दिया था। आपने वैखरी वाणी द्वारा जप करके प्रथम कोष व प्रथम केन्द्र मूल को शुद्ध कर लिया था, जब मूलबन्द शुद्ध होता है तो पशुबुद्धि निवृत होकर मानवता के गुण प्रगट होने लगते हैं कुछ समय बाद आपने मध्यमा में जप करके द्वितीय केन्द्र स्वाधिष्ठान को शुद्ध कर लिया था, जब स्वाधिष्ठान केन्द्र शुद्ध होता है तो बुद्धि कुशाग्र होकर प्रज्ञा में बदलने लगती हैं। थोड़े ही समय बाद आपने पश्यन्ति से जप करना शुरू कर दिया था, इस स्थिति में जाप होने से रिद्धि सिद्धियों का प्राकट्य होता है तथा तीन केन्द्र एक साथ विकसित होते है - मणिपुर केन्द्र, हृदय चक्र तथा विशुद्धाक्य चक्र । श्री दरियावजी महाराज ने तीव्र साधना करते हुए शब्द को परा में स्थिति किया था, इस स्थिति में अनाहत चक्र व आज्ञा चक्र खुल जाते है जिससे साधक की दिव्य दृष्टि खुलने लगती हैं। फिर दरियावजी महाराज ने सहस्रारचक्र को पार करते हुए परम सत्ता का साक्षात्कार कर लिया था । यथा :- 
  'जन दरिया जाय गगन में, परसा देव अनाद । 
  असुध बिसरी सुध भई, मिटिया वाद विवाद ।।
   श्रीमद् दरियावजी महाराज ने उक्त साधना का वर्णन अपनी अनुभव वाणी जी के "नाद परचा अंग" में किया हैं। आपके लिए यह साधना खेल मात्र रही, किन्तु आपने इस साधना का अनुसरण करके कलिकाल के असंख्य जीवों के कल्याण के लिए मार्ग बना दिया, जिससे आसानी से साधक इस पर चलकर अपने लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है।

श्रीमद दरियावजी महाराज ने परम तत्व का साक्षात्कार करने के बाद एक दिन सद्गुरू प्रेमदासजी महाराज को दण्डवत प्रणाम किया था। यथा:-


दरिया: सतगुरू दीन दयाल के, चरण निवायो शीश। 
प्रेम दास प्रसन्न भए, सुण रामस्नेही ईश ।।

तब गुरूजी ने आशीर्वाद देते हुए कहा :-

भेख तुम्हारा चालसी, सुन रामस्नेही बात।
 रामस्नेही धर्म के होगें तुम सिरताज ॥ 
 अनन्त जीवों को तारसी, यह मेरा आशीर्वाद ।
 राम स्नेही धर्म से, सुधरे सब काज ।।
 दरिया- राम स्नेही मुझको किया, प्रेम पुरूष महाराज।
  दरिया रग रग में धुन्न राम की, अखै सुन्नमें राज ।।

इस प्रकार सद्गुरू प्रेमदास जी महाराज ने श्री दरियाव जी महाराज को रामस्नेही सम्प्रदाय चलाने का आशीर्वाद दिया था। उसके बाद भी दरियाव जी महाराज निरन्तर राम भजन में लगे रहे। थे। उन्होंने रेण नगर के आस-पास कई जगह जहाँ एकान्त मिलता था वहीं साधना-तपस्या की थी जैसे :- रेणग्राम में स्थित रामसभागार, लाखोलाव सागर का तट जहाँ अभी राम धाम बना हुआ हैं, लाखासागर का बरगू, खेजड़ा जी (रेण से मेड़ता की तरफ कुछ मील दूर) आदि ।

श्रीमद् दरियावजी महाराज का गुरू जी के प्रति विशेष आदर भाव था। जब आपके गुरूजी ने विवाह कर लिया था, तब भी गुरू जी में दिव्य लीला का ही दर्शन किया था। इसीलिए गुरूजी का विशेष आशीर्वाद आप पर था। आप गुरू जी के श्री चरणों में हमेशा इस पद के द्वारा प्रार्थना करते ही रहते थे। जैसे :- 

पद :- 
मैं अरज करूँ गुरां थाने, चरणां में राखज्यों म्हानें ।।
हेलो प्रकट कहूँ चाहे छानें, म्हारी लाज शर्म सब थानें । । टेर ।। 
माता-पिता सुत भ्राता, सब स्वार्थ का है नाता। 
तारण तिरण गुरू दाता, चारों वेद गुण गाता ।।1।। 
भवसागर भरियों भारो, मोय सूजत नहीं किनारो।
 मैं डूब रहयो मंझधारों, गुरू घट में दया विचारो ।।2।।
 गुरू जग में लिया अवतारों, जीवां ने पार उतारो। 
मोय आयो भरोसो भारो, नहीं छोडूं शरणो तुम्हारो ॥3॥
तन मन धन सब थांरो, चाहे शीश काट लो म्हारो। 
जनदरिया दास पुकारो, चरणांरो चाकर थारो ।।4 ।। 

महाराज जी का आदेश पाकर आपने राम भक्ति का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया था। आपकी  सत्संग में धीरे-धीरे हजारों भक्त जन आने लगे थे। आपके दर्शन, सत्संग व आशीर्वाद से अनेकों भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती थी। आपके जीवन में कई दिव्य घटनाएँ घटि थी, उन में से कुछ इस प्रकार है :-

पूर्णदास जी महाराज की देवी के कोप से रक्षा करना : श्री पूरणदासजी महाराज रेण के ही रहने वाले थे। ये दो भाई थे, दोनों ही देवी की पूजा करते थे। जब श्री दरियाव जी महाराज की महिमा सुनी तो, उनसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए आए। तब श्री दरियावजी महाराज ने उनके हृदय की बात को जानकर कहा कि -" पूर्ण! तुम तो आन उपासना करता है।। आन उपासना करने वाले को नरक में जाना पड़ता है। देवी-देवता ये सब रामजी की माया है और माया की पूजा करने से मुक्ति नहीं होती है। हे पूर्ण ! मानव तन बड़ा ही दुर्लभ से प्राप्त होता है, इसे रामभजन के बिना व्यर्थ की आन उपासना में नहीं गमाना चाहिए।" इस प्रकार श्रीमद् दरियावजी महाराज की सतसंग सुनकर पूर्णदासजी अपने घर आये और भोजनादि करके सो गये। इस दिन उन्होनें देवी की धूप पूजा आरती आदी नहीं की। रात्री के समय देवी ने पूर्णदास जी पर बड़ा भारी प्रकोप किया और प्रगट होकर पूर्णदास जी को धमकाने लगी, डराने लगी। उसी समय सद्गुरू की महिमा जानकर श्री पूर्णदास जी महाराज ने श्री दरियाव जी महाराज को रक्षार्थ याद किया। उसी क्षण श्री दरियावजी महाराज प्रगट हुए और देवी महाराज का दर्शन करके प्रसन्न होकर चली गई। इधर श्री दरियावजी महाराज भी पुनः अपने धाम को आ गये। सुबह होते ही श्री पूर्णदास जी महाराज श्रीमद् दरियावजी महाराज की शरण में आ गये और आप बीती सुनाई। पूर्णदास जी की पूर्ण शरणागति का भाव देखकर महाराज ने उन्हें उसी प्रकार ध्यान योग का मार्ग बताया जैसे सद्गुरू कबीर साहेब ने धनी धर्मदास जी महाराज को बताया था। श्री पूर्णदास जी महाराज श्रीमद दरियाव जी महाराज के बहत्तर शिष्यों में से प्रथम शिष्य थे और उन्होंने राम भजन करके पूर्ण पद प्राप्त किया था। यथा

"प्रथम मिले दरियाव सु, पूरणदास जन जांण। 
राम मंत्र दरिया दियो, मिट गई खेचा ताण ।। 
पूरणदास परचे भये, सिर पे दरियादास।
कलह भरमना मिट गई, हिरदे नांव प्रकाश ॥ 
पूरणदास समरथ भये, सतगुरू के प्रताप।
रायण नगर के मायने, जप्या अजपा जाय।।" 

श्री पूर्णदासजी महाराज की महिमा करते हुए संत श्री रामदासजी महाराज कहते है कि-

“पूरणदास प्रेमरस पीया सद्गुरु संग मिल जुग जुग जीया ।
अर्थात- पूर्णदास जी महाराज ने सद्गुरू की शरणागति लेकर राम भजन करके परमात्मा की प्राप्ति कर ली थी। श्री पूर्णदास जी महाराज ने मध्य प्रदेश के झॉकर नगर में शरीर का त्याग किया था। वहाँ आज भी उनकी समाधि हैं।

षडयंत्रकारियों के प्रयास विफल:- श्रीमद् दरियाव जी महाराज के दिव्य तेज व प्रभाव को देखकर बहुत से हिन्दू अपने धर्म में दृढ़ रहने लगे और यहाँ तक कि हिन्दुओं में से बने मुसलमान वे फिर से हिन्दु धर्म अपनाने लगे थे। श्री दरियाव जी महाराज के मामा के पुत्र भी मुसलमानों के पंजे से निकलकर राम भजन में लग गये थे फतहराज, कुशालीराम व हंसाराम ये मामा के पुत्र थे, इनमें फतहराज बाद में बेमुख हो गये थे। श्री मद् दरियाव जी महाराज का इतना प्रभाव बढ़ा कि मारवाड़ से राजा लोग भी आपकी शरणागति में आने लगे थे जैसे मारवाड़ के राजा बखतसिंह जी, जोधपुर के राजा विजय सिंह जी व जयपुर नरेश आदि। एक बार आप जयपुर नरेश के निमन्त्रण पर शिष्यों सहित जयपुर को जा रहे थे, तो रास्ते में भादुगाँव में कुए के जल को गंगाजल के समान मीठा किया था। ऐसे ही आपकी महिमा सुनकर रेण के पास जावली गाँव का केसोरामजी जाट पुत्र की कामना लेकर आपने पास आया था, उसे पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। समयानुसार केसोरामजी जाट को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।

इस प्रकार दिनों दिन बढ़ते प्रभाव को देखकर दिल्ली के बादशाह ने अपने दीवान मदली खान पठान को आपकी हत्या करने के लिए भेजा था। वह हत्या करने में विफल हुआ और ज्यों ही आपकी दृष्टि उन पर पड़ी तो वह आपके श्री चरणों में गिर गया तथा तलवार रख कर आपका शिष्य बन गया था। इसी तरह अजमेर मेड़ता के काजियों व मौलवियों द्वारा भेजे गए अत्याचारी व कुचक्री यवनों ने श्री दरियावजी महाराज के विरूद्ध षडयंत्र रचे थे। उन्होंने विष युक्त मिष्ठान जब महाराज श्री के सामने लाकर रखे थे, तभी आकाशवाणी द्वारा देवताओं ने उस मिष्ठान्न में मिले हुए विष को घोषित कर दिया था। ऐसे अनेक कुचक्र व अत्याचार महाराज श्री पर किए गए किन्तु सभी षडयंत्र नाकाम रहे थे। 

सांजु गांव के जाट का भाग्य उदय होनाः- श्रीमद् दरियावजी महाराज के शिष्य सांजुगाँव के श्री
मनसाराम जी मौदानी जी ने आपकी पधरावणी अपने यहाँ करवाई थी। किन्तु अतिभाव-प्रेम में वे तीनों ही भाई आपको प्रसाद कराना भूल गये थे। जब दरियाव जी महाराज वापिस रेण के लिए आ रहे थे तो रास्ते में एक जाट ने ताजा बाजरे का फूँक महाराज श्री व शिष्यों को जीमाया था। दरियाव जी महाराज ने फूँक का प्रसाद पाया और अति प्रसन्न हुए थे। पीछे मोदाणी परिवार को पता चला कि "हम लोगों ने महाराज श्री को प्रसाद भी नहीं जीमाया हैं। अतः प्रसाद लेकर वे रेण को आये थे तब श्री दरियाव श्री महाराज ने कहा -"प्रसाद पाने का पुण्य तो उस जाट को मिल गया है अतः आपको उस पुण्य का भागीदार बनना है तो रूपया पैसा लेकर जाओं और उस जाट को देकर के आओं।" मोदाणी परिवार के सदस्य पैसा लेकर जाट के पास गये और कहा कि महाराज श्री ने आपके द्वारा जो बाजरे के फूँक का प्रसाद पाया था, उस पुण्य के भागीदार आप हमें भी बनाओं और ये रूपये ले लो किन्तु वह जाट बहुत समझदार था। उसने कहा कि ये घाटे का सौदा मैं नहीं कर सकता हूँ मुझे आपका एक भी पैसा नही लेना हैं। उस जाट ने मोदाणी परिवार का एक भी पैसा नहीं लिया था, इसके फलस्वरूप वह जाट अगले जनम में उच्च कुल में जनम लेकर आचार्य श्री हरकाराम जी महाराज का शिष्य बनकर रेण रामस्नेही सम्प्रदाय के तीसरे आचार्य श्री रामकरण जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। श्रीरामकरण जी महाराज का जन्म वि.स. 1836, भाद्र पद शुक्ला चतुर्दशी को श्री हरकारामजी महाराज के बड़े भ्राता श्री लिखमीचन्द जी सेठ (जैन श्रावक ) के यहाँ हुआ था। आपकी माताजी का नाम सारा बाई जी था। आपने सतोत्तर ( 77 ) वर्ष तक रेण की गादी संभाली थी। यथा:-

जन दरिया महाराज, आप सांजु में आया। 
निमस्कार कर जोड़, जाट जब शीश निवाया ।।1।।
भाव प्रेम रस रीत, प्रीत कर फूँक जीमाया। 
जन दरिया महाराज, आप तंदुल ज्यूँ पाया ।।2।। 
प्रसन्न भया महाराज, सभा में गिरा उचारी। 
नफो लीयो है जाट, बन्दगी कीनी भारी ।।3।। 
मोदाण्यां सुण बात, कह्यों अब कैसे कीजे। 
मन माग्यां सो दाम, चाल फेर उनको दीजे ।।4।। 
रूपया दाम सो लेर गया, जब तीनुं भाई। 
कही जाट को बात, दाय उनके नहीं आई ।।5।। 
म्हारे तो परताप, दास दरिया सा को भारी। 
मनसा भोजन मिले, राबड्यां दूध त्यारी ।।6।। 
फूंका का प्रसाद ते, भई बात इदकार। 
बडयो भाग उस जाट को, बड़ जितनों विसतार ।।7 ।। 
बडयो भाग बिस्तार, जनम उच्च कुलां में पायो। 
राम भजन के प्रताप सूं, जाट अमरापुर सिधायो।।8।। 

दिल्ली के मधुचन्द सेठ को जल में डूबने से बचाना :- श्री दरियाव जी महाराज का शिष्य श्री मधुचन्द जी जैन दिल्ली में रहते थे। वह एक दिन जमुना जी में नहाने के लिए गए थे। नहाते-नहाते वह गहरे जल में चले गये थे। तैरना उनको आता नहीं था अतः डूबने लगे थे। डूबते-डूबते उन्होंनें अपने गुरूदेव श्री दरियाव जी महाराज को आर्त भाव से पुकारा :- "करूणां करि पुकार, दास दरिया उबारो । मो अबला की लाज राखज्यों बिड़द तुम्हारो ।। उनकी आर्तभाव की पुकार सुनकर श्री दरियाव जी महाराज रेण राम सभा में से अन्तर्ध्यान हुए और दिल्ली में यमुना नदी में प्रकट होकर श्री मधुचन्द सेठ को बाहर करके पुनः राम सभा में प्रकट हो गये थे। उस समय श्री दरियाव जी महाराज के हाथ की बाहे पानी से भीगी हुई थी, तब शिष्यों ने पूछा कि - गुरूदेव आपकी यह इस
हाथ की बांह भीगी हुई क्यूँ हैं ? श्री दरियाव जी महाराज ने अपने शिष्यों से कहा- मधुचन्द सेठ को डुबते हुए को बचाने के लिए दिल्ली के पास यमुना नदी में गया था। यथा कलु काल परचो भयो, जाणे जग संसार जन दरिया परताप से, तिरियो साहुकार ।। सब शिष्य गुरूदेव की इस लीला को सुनकर अति प्रसन्न हुए और विश्वास पूर्वक राम भजन में लग गये थे।

इसी प्रकार श्रीमद् दरियाव जी महाराज के जीवन में बहुत सी दिव्य घटनाएँ घटी हैं। जैसे- शिष्य चतुर्दास जी के कटे हुए हाथ पुनः ठीक हो जाना, मेड़ता सीटि से रेण जाते समय श्री दरियाव जी महाराज के आगे भैरव द्वारा प्रकाश करना (सेवा रूप में ) फतेहचन्द ब्राह्मण के भोजन से दूध की धारा बहाना व राजसी भोजन से रक्त की धारा का बहना (यह घटना मेड़ता सिटी में घटि थी), शिष्य उदयराम जी की डाकुओं से रक्षा करने के लिए नोखा (मण्डी) के पास प्रकट होना तथा अकासर में शिष्या किस्तुरां बाई जी को दर्शन देना आदि। 

महानिर्वाण :- आचार्य श्री दरियाव जी महाराज ने अपने शिष्यों को राम भजन का आदेश दिया और स्वयं चौथे पद में स्थिति रहने लगे थे। उस समय में आपकी स्थिति परम हंसों जैसी दिखाई देती थी। शिष्यों ने समझ लिया कि - अब महाराज श्री अधिक समय तक इस धरा पर नहीं रहेगें। तदनुसार वि.सं. मार्गशीर्ष की पूर्णिमा की सवा पहर रात्रि बीतने पर महाराज श्री ध्यान मुद्रा में स्थित हो गए। उस समय आकाश मण्डल में भगवान श्री हरि ने अपना गरूड़ ध्वज युक्त विमान भेजा था। आप उस विमान में आरूढ़ हो गये थे। शिष्यों की विरह दशा, करूण क्रंदन्न को देखकर आपने उसी विमान में से राम भजन का आदेश फरमाया था और इस पावन वसून्धरा पर बयांसी वर्ष तीन मास व इक्कीस दिन रहें थे। आपके परम धाम जाते ही पृथ्वी पर सन्नाटा छा गया था।भक्तलोग लम्बे समय तक विरह में गलतान रहे थे।


Wednesday, 7 December 2022

कुण जाणे दर्द हमारा, म्हारा बिछड़ीया राम प्यारा

कुण जाणे दर्द हमारा, म्हारा बिछड़ीया राम प्यारा ।। टेर ।।
 नाम उणा को दरिया, वे सुख सागर से भरिया। हम शरणे बांकी रहेता, माने राम भजन की कहता ।। 1 ।। 
हम दर्शन करने जाता, माने भर भर अमृत पाता। अब पूठ हमारी खाली, म्हारे शब्द कटारी साली ।। 2 ।। 
मोय बिछड़ियां दुःख दिया, म्हारे हिवड़े करवत बहिया। म्हारी अमृत गागर फूटी, म्हारे हीरां की लड़ टूटी । । 3 ।। 
गुरू दरिया मोक्ष सिधाया, म्हारा नैन उमट भर आया। मैं तो सब जग ढूँढण जाऊं, मैं वा सुरत कटासूं पाऊं ।। 4 ।। 
म्हारे तन बिच तालाबेली, जैसे जल बिन मीन दुहेली। कहे' सुखराम' सन्देशो, गुरू मिलिया जाय अन्देशो ।। 5 ।।