Saturday, 16 September 2017

36 . परोपकार करके ही धन का पात्र बनता है :

36 . परोपकार करके ही धन का पात्र बनता है :
मानव ईष्या ,द्वेष व घृणा के कारण अपने को श्रेष्ठ तथा दूसरों को हीन समझता है और अकारण ही क्रोधावेश में दूसरों को अपने वंगबानो से पीड़ा पहुँचाता रहता है । जो पुरुष अपनी क्रोधग्नि को अपने हृदय में शांत कर लेता है और अपने कठोर वचनों से दूसरों के हृदय को आगात नही पहुचता है वह शांत प्रकति व्यक्ति तीनो (सत्व रज तम ) गुणों पर विजय प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य इस नाशवान शरीर से दुखी प्राणियों पर दया करके मुख्यतः धर्म,तथा गौरत यश प्राप्त नही करता वह जड़ पेड़ पौधों से हीन( गया बिता )है । महापुरूषो ने इस अविनाशी धर्म की उपासना की है । किसी भी प्राणी के दुख में दुख का अनुभव करना तथा सुख में सुख का अनुभव करना ही मानव धर्म है।खेद इस बात का है कि मरणशील मानव अपने शरीर बुद्धि व धन से परोपकार नही करता है । जगत के जन ,धन ,शरीर व सभी प्रदार्थ क्षण भ्रगुर है अतः इनको परोपकार में लगाना ही धर्म का पात्र बनता है ।

न ही वैरेण वैराणी शम्यांतिः कदाचन।
अवैरण च शमियान्ति एषः धर्म सनातनः ।।
सागर के बिखरे मोती
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्री "*

35. आत्मा को जानना ही ज्ञान की उपयोगिता है

35. आत्मा को जानना ही ज्ञान की उपयोगिता है :
जड़ चेतन मय विश्व मे चेतन्य की ही प्रधानता है । संसार मे यावत चेतन्य प्रवृत्ति है उसमें भी चित की ही मुख्यता है इसलिये विस्तृत वेद ( ज्ञान-रश्मि ) में इस चित्त को चिन्तामणि कहते है। लोक की असंख्य स्वर्ण राशि,असंख्य रत्न और अन्य जितनी भी सांसारिक बहुमूल्य वस्तुएं है वे सभी इस चिन्तामणि के तुल्य नही हो सकती है । मुक्ति भक्ति पुरुषार्थ चतुष्टय इस चित के ही अधीन है । यदि इस चित रूपी चिन्तामणि का उपयोग नाम स्मरण में किया जाय तो इसकी सार्थकता है । विवेकहीन मानव इसका उपयोग न जानने के कारण ही दुखी है । यदि जीव संत महापुरूषो के सत्संग से इसका सदूपयोग करने लगे तो वह परम पवित्र बनकर लोक परलोक दोनों की समस्याओं का समाधान करके  सत्यमेव स्वतः ही शिव (राम व ब्रह्म ) बन सकता है। यह जीव इन महामणि आत्म स्वरूप को न पहचानने के कारण ही अविनाशी पद को प्राप्त करने में असमर्थ है ।
अनादि काल से सतगुरू इस अमूल्य अलौकिक चिन्ता मणि की और जीवो को प्रेरित करते रहे है। संत और वेद मत भिन्न नही है । वे वैदिक ऋषि देश काल पात्र के अनुसार समय समय पर इस चिन्तामणि के महत्व को प्रर्दशित करते रहे है अतः आत्मा को जानना ही ज्ञान की उपयोगिता है ।
जीव ब्रह्म का अंश है ज्यूँ रवि का प्रतिबिम्ब होय।
घट पड़दा दुरा भया ब्रह्म जीव नही दोय।।
"सागर के बिखरे मोती
*रेण पीठाधीश्वर " श्री हरिनारायण जी शास्त्री "*⛳

34 . माया के स्वरूप को जानना ही ईश्वर प्राप्ति करना है:

34 . माया के स्वरूप को जानना ही ईश्वर प्राप्ति करना है:
नाशवान शरीर की सुंदरता का अभिमान न करके शरीर के द्वारा राम भजन व सत्संग करना तथा प्राणी मात्र को भगवत स्वरूप समझकर सबकी सेवा करना ही शरीर की उपयोगिता है ।
                  तीन लोक चौदह भुवन व यह दृश्यमान जगत सब परिवर्तनशील है अतः इसकी ममता त्याग कर राम नाम जाप करना ही सार्थकता है । प्राणी मात्र मृत्यु  ( काल ) से भयभीत है परन्तु महाकाल (राम ) मृत्यु (काल) को भी मरता है अतः इनकी (राम नाम) शरण ग्रहण कर लेने पर मानव सभी प्रकार के भय चिन्ताओ से मुक्त हो जाता है । जीवन मे माया का बड़ा दुष्प्रभाव है । माया एक सर्पिणी के समान है ,सर्पिणी अपने शरीर को कुंडलाकार बना कर बच्चे देती है । कुंडलाकार (चारो ओर के भीतरी भाग में ) में रहने वाले अपने ही बच्चों को खा जाती है परन्तु जी बच्चा कुंडलाकार से बाहर निकल जाता है वह मृतु से बच जाता है ,ऐसे ही माया ही जीवों की भक्षक बनती है लेकिन जो व्यक्ति इस माया रूपी सर्पिणी (परिवार,धन,समाज,संसार शरीर के अध्यास) के विषय मे ज्ञान प्राप्त करके इसे मिथ्या समझ कर इसके कुंडलाकार (आसक्ति) से बचकर निकल जाता है वही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है अतः माया के स्वरूप को जानना ही ईश्वर को जानना है ।

संतो माया सबकु लुटे,
है जग में ऐसा जन कोई राम नाम कहि छुटे।
संतो कहा गृहस्थ कहा त्यागी
जेहि देखूं तेहि बाहर भीतर घट घट माया लागी।। 

 *सागर के बिखरे मोती*
*रेण पीठाधीश्वर "श्री हरिनारायण जी शास्त्री "*

33. आसक्ति युक्त जीवन ही बन्धन है:

33. आसक्ति युक्त जीवन ही बन्धन है:
इस जीवन एवं संसार मे सर्वाधिक महत्व ईश्वर का ही है । ईश्वर (*राम*) सर्वसक्तिमान सर्वज्ञ एवं सर्वत्र होने से वह अलौकिक है । सर्वगुण सम्पन होने के कारण ईश्वर का प्रभुत्व ही सर्व विदित है अतः सर्व शक्तिमान प्रभु का स्मरण करना ही जीवन का लाभ है । मानव राम  ( ईश्वर ) नाम का स्मरण करके तथा मानव मात्र में ईश्वर की सत्ता समझकर अपना जीवन सार्थक कर सकता है । सत्य, सदाचार, दान दक्षिणा, सेवा सत्कार तथा सबको सुख पहुचाने वाले शुभ कार्य करके ही मनुष्य उस परम तत्व परमात्मा को प्राप्त कर सकता है । परमात्मा के स्वरूप को जानने से ही उसमें अनुराग उत्पन होता है । संतो के सत्संग से ही हम ईश्वर को जानने में सफल हो सकते है । प्रदार्थ के सदुपयोग का नाम ही योग है और इनके दुरुपयोग को ही रोग कहते है । इसलिए प्रभु प्रदत प्रदार्थो ( रुपये वस्तु आदि ) को अभावग्रस्त लोगों तक पहुँचा कर उनकी सेवा कर उन्हें सुख पहुंचाना सदुपयोग है । सांसारिक वस्तुएं बुरी नही होती है परन्तु जब मानव उनको अपनी मानकर असक्तिपूर्ण भोग बुद्धि से भोगता है तब वे बन्धन का कारण बन जाती है और यदि मानव अनासक्त भाव से वस्तुओं का उपभोग करता है तो उसे मुक्त ही कहना चाहिये । अतः आसक्ति युक्त जीवन ही बंधन है ।
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जन दरिया गुरूदेव जी सब विधि दई बताय।
जो चाहो निज धाम को सांस उसांसो धयाय।।
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"सागर के बिखरे मोती"
*रेण पीठाधीश्वर " श्री हरिनारायण जी शास्त्री "*

Friday, 1 September 2017

32. सावधान होना ही जागना है

32. सावधान होना ही जागना है :
अनादि ऋषियों, मुनियों द्वारा प्रदत्त ज्ञान ( वेद भगवान के आदेश ) को आलोकित ओर विलोकित करके सांसारिक मोह माया को त्याग कर अविलं सावधानी पूर्वक परमात्मा तत्व को ही स्वीकार करना चाहिए । यह शरीर क्षण विध्वशी है अतः अतिशीघ्र चेत कर ईश्वर भजन में मन लगाने से ही जीव चेतन्य तत्व को प्राप्त कर सकता है क्योंकि यह जीव ( अन्त करन अविच्छिन्न चेतन्य ) एक मेहमान के समान है । न जाने यह इस तन धन को त्याग कर कब परलोक सिधार जाय । जितने भी सांसारिक संबंध है वे सब मिथ्या है , क्षण स्थाई है ,इनसे सावधान होना ही जीवन मे जागना है। इस प्रतिभसिक संसार मे भगवान का नाम ही सत्य है । संसार तो मृगमरीचिका ( मृगतृष्णा ) के समान मिथ्या हव । सोत्रीय ब्रह्मनिष्ठ महापुरूषो का सत्संग करके आत्मज्ञान  ( राम भजन ) से ही जीव चैतन्य (सजग ) हो सकता है , अन्यथा यह जड़ के समान ही है । मानव की यह दुर्बलता है कि वह सांसारिक कर्म करने में रुचि लेता है लेकिन ईश्वर भजन को महत्व नही देता है । मरनोउपरांत स्वतः ही ऐहिक लौकिक सर्वसम्पति का त्याग हो जाता है केवल बुरे कर्मो का पाप साथ चलता है अतः ईश्वर स्मरण तथा परोपकार रहित जीवन ही छलना व मिथ्या है इसलिए सभी शास्त्र संत वास्तविक पवित्र सुखी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दे रहे है । अतः सत्संग के प्रभाव से ईश्वर स्मरण करना ही जीवन मे सावधान होकर जगाना है ।
दरिया साँचा राम है,फिर साँचा है संत ।
वह तो दाता मुक्ति का,वह मुख राम कहन्त।।
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माया खायो सकल जग,सक्यो न कोई भाग।
उबरया कोई संत जन राम भजन लिव लाग।।
 सागर के बिखरे मोती 
रेणपीठाधीश्वर *" श्री हरिनारायण जी शास्त्री "*

31. मन ही बन्धन व मोक्ष का कारण है

31. मन ही बन्धन व मोक्ष का कारण है :
यह संसार असार है तथा मानव शरीर भी क्षण भंगुर है। मृत्यु के समय मनुष्य का परिवार एवं धन साथ नही चलते हैं केवल उसका धर्म व सत्कर्म ही साथ जाते है फिर भी मनुषय अज्ञानवश विषयो व सुखों के पीछे भागता रहता है ।  सांसारिक वातावरण से प्रभवित होने के कारण संसार एवं सांसारिक नाशवान प्रदार्थो के अतिरिक्त अन्य कही भी परम आनंद की प्राप्ति का प्रयत्न नही करता है। आनंद प्राप्ति का सत्य स्त्रोत एक परमात्मा ही है जो श्रोत्रिय बाह्मनिष्ठ महापुरूषो के सत्संग व उनकी कृपा माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है । शास्त्रों में मन को ही इस जीव के बन्धन व मोक्ष का कारण माना गया है। जब मन इन सांसारिक विषय वासना में आसक्त हो जाता है तब वह बन्धन का कारण बनता है ओर जब यही मन ईश्वर भगति में लीन हो जाता है तब वह मोक्ष का कारण बन जाता है अतः मन ही मोक्ष व बन्धन का कारण है । 
मनः एवं मनुष्याणं कारण बन्धनमोक्षयो:
सागर के बिखरे मोती
रेण पीठाधीश्वर " श्री हरिनारायण जी शास्त्री "

30 . स्वरूप भिन्न भिन्न पर ईश्वर एक है

30 . स्वरूप भिन्न भिन्न पर ईश्वर एक है
सृष्टि के प्रारम्भ से ही मानव के स्वभाव व रुचि में भिन्नता चली आ रही है। रुचि भिंन्नता के कारण ही खान पान ,रहन सहन एवं विचारों में भी भेद भाव बढ़ता गया और इस तरह भिन्न भिन्न धर्मो का प्रचलन । धार्मिक भेद भावों ने अपने अपने विचारों एवं मान्यताओं के आधार पर सृष्टि रचयता भगवान के स्वरूप को भी अलग अलग रूप में प्रस्तुत किया । अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार भगवान के अनेक नामकरण किये गए । भगवान की पूजा व भगति की कई प्रकार की पद्धतियों का प्रचलन हुआ और इसप्रकार अन्त में भगवान कि पूजा पद्धति को ही संकीर्ण 'धर्म' का नाम दिया गया ।इन विभिन पूजा उपासना पद्धतियों के कारण  मानव मानव का शत्रु बन गया । धर्म के नाम पर समाज  व  देश मे फुट डालने वाले, अशांति फैलाने वाले असामाजिक तत्वों से सावधान रहना चाहिये । वैसे भगवान स्वयं जब जब असामाजिक तत्वों का प्रभाव बढ़ जाता है तब तब इन दुष्टों का संहार करने तथा सदाचार की पुनः स्थापना हेतु अवतार लेते है । वास्तव में ईश्वर अनन्त रूपो में होने पर भी एक ही है ।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ सर्वव्यापी सर्वभूतंत्रात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवास साक्षी चेता केवलो निरवूनश्च।।
सागर के बिखरे मोती
रेण पीठाधीश्वर " श्री हरिनारायण जी शास्त्री "