Monday, 17 October 2022

अथ समनजी को प्रसंग

अथ समनजी को प्रसंग

इस प्रसंग में आचार्य श्री दरियाव जी महाप्रभु द्वारा पागल कुत्ता से काटा हुआ समन महात्मा की रक्षा करना।

सहर सलेमा बाज, संमन जन आप विराज्या ।
जन दरिया परताप, भजन सिवरण भल साज्या ॥

एक दिन भयो विजोग, बीठले लाल लगाई। 
उपज्यो दुःख शरीर, कहण में आवे नाही ॥

घड़ी पहर के माहीं, देह को होतब आयो । 
समन करी पुकार, दास दरिया सुण पायो ॥

दया करी म्हाराज, राहेण सुं आप पधारया ।
सहर सलिमा बाद, शिष कुं जाय उबारया ॥

धन सम्रथ महाराज, क्रपा कर दर्शन दीन्हां । 
मीरां वाली बात, जहर अमृत कर लीन्हां ॥

करी पुत्र की साह, प्रगट अब सुणज्यो साखी। 
भरगु सुकर जिसी, राम परतग्या राखी ॥

Friday, 14 October 2022

अथ फतैचंदजी भोजन को प्रसंग

अथ फतैचंदजी भोजन को प्रसंग

इस प्रसंग में मेड़ता सिटी के सेवक (ब्राह्मण) फतहचन्द का आचार्य महाप्रभु को निमंत्रण देना। प्रेम के कारण से भूल से भोजन में तेल परोसना महाराज की कृपा से तेल का घृत बन जाना।

फतैचंद भोजग मेड़ते रहे वड भागी । 
जन की प्रीत सवाय, दास दरिया सुं लागी ॥
करी एक दिन अरज, आप परसाद करीजे । 
पूरब प्रीत पिछाण, मोय गिणती में लीजे ॥ 
धिन मेरो वड भाग, आप की कृपा भारी। 
आय मिल्यो संजोग, वीदर घर किसन मुरारी ।।
 राजा के प्रतीत, आप की मन में साची । 
 लिया जद आराध, रहण सुं कीनी आछी ।। 
 ओरां को परसाद, राज सूं करी मनाई। 
 ओ मोसर ओ डाव, फेर असो नहीं आई ।। 
 फतेचंद कर जोङ, कहयो सादां के आगे । 
 आप करो परसाद, भाग भल मेरो जागे ॥
  सुणे बात दरबार, करे राजा तकरारी । 
  धन समर्थ म्हाराज, दया दिल देखो म्हारी ॥
   आग्या दीवी म्हाराज, आप किरपा कर भारी । 
   कर बेगो परसाद, होय हाजर सो तियारी ॥ 
   प्रेम मगन मतवाला, ईस्यो मन माही हुँस्यो। 
   भयो तियार परसाद, तेल जब आण परुस्या ॥ 
   जीम जूट म्हाराज, आप तब चलु कराई। 
   फतेचंद ने बात याद, जब मन में आई ॥ 
   हो हो किरपा निधान, जलम मेरो मैं हारयो । 
   धिरत जाण म्हाराज, तेल भोजन में डारयो ॥
   ईस्यो दोष अपराध, कोहो कैसी विध जावे। 
   बार बार सेवग, आप मन में पिसतावे ।।
    कहयो दास दरियाव, प्रीत साधां सुंथारी। 
    आज परसाद स्वाद, बोत विध लागो भारी ॥ 
    भयो तेल को श्रीत, रामजी आछी कीनी।
     आद अंत म्हाराज, सोब संता ने दीनी ॥ 
     बालमीत पंच ग्रास, लिया पांडवा के द्वारे। 
     वागो संख पचाण, प्रगट सब संत पुकारे ॥ 
     कीसन देव म्हाराज, भगत की सिपत बधारी । 
     पंडवां के जिग माहिं, करी अत महिमा भारी ॥ 
     साग बीदर घर पाय, प्रीत का छूत अरोग्या । 
     तंदुल सुदामा दिया, महल कंचन का होग्या ॥
      इस्यो संत गोग्रास, ताय सम तुले न कोई । 
      तीन लोक वैकुंठ, ब्रह्मा लग प्रकट होई ॥ 
      सिव ब्रह्मा अरु सेस, आहा नारायण भाखी।
       भगवंत श्रीमद्, फेर रामायण साषी ॥

दोहा

सानभद्र को जीव थो, पेलै जन्म मेघवाल । 
आहार दियो भगवंत को, तूठा दीन दयाल ॥ 
धन व निंद सदा, कंचन जड़त अवास। 
जनम लियो साह गोमंद घर, सेनक नगरी वास ॥

अथ राजा विजेसिंघजी को प्रसंग

अथ राजा विजेसिंघजी को प्रसंग

इस प्रसंग में श्री विजय सिंह जी का सेना समेत मेड़ता सिटी में ठहरना व आचार्य श्री को बुलाकर सेवा करना और आचार्य महाप्रभु की आज्ञा मानकर मेड़ता परगना में कर माफ करना ।

विजेपाल भोपाल, भगत नोदा इदकारी। 
जन दरिया सुं प्रीत, रीत आरत उर धारी ॥
मोरधज अम्रीक, परीखत जैसो राजा। 
जोधाणा नाथ सुनाथ, चले दरसण के काजा ॥ 
च्यार सीरायत साथ, मीसल आठु ही लारे । 
दर कूचां घरबार, मेड़ते आप पधारया ।।
भाव प्रेम जग्यास, साध लावो एक छिन में। 
में दरसण को प्यास, धार आयो हूँ मन में । 
गंगादास नाजर, दूसरो गोरधन खींची। 
चढया वेग तत काल, बात सो कीनी ऊंची ॥ 
राहेण नगर मंजार, लेण साधांनु आया। 
भाव प्रेम परसाद, भेट नारेल चढ़ाया ॥ 
अरज करी कर जोड़, मेड़ते आप पधारो । 
हो करुणा का भवन, चरण राजा घर धारो ॥ 
रथ बैठे दरियाव, मेड़ते आप सिधाया । 
नरपत कर उछाव, मोतीयां थाल बंदाया ॥ 
रहया दिन पचीस, मेड़ते नगर मंजारा । 
राजा परजा रेत, दरसण मिल आया सारा ॥ 
अयेसो नाम परताप, नरपत सो चरणां लागा। 
सुण्या ग्यान बहैबीत, भरम सारा का भागा ॥ 
तब राजा बीजे पाल, भेट पूजा विसतारी। 
लाग बाग सब माफ, सही कर दीनी सारी ॥ 
बीजेपाल नरपत राय, मेड़ते डेरा दीना । 
जन दरियां का दरसण, परसण होय परगट कीना ॥
नित नेम परसाद, राज सुं थाल पुगावे । 
जन दरिया म्हाराज, आप जब भोजन पावे ॥ 
वालमीत ज्यूं प्रगट, ईस्या महाराज कहीजे । 
कहयो राजा विजेपाल, नफो पाडवां ज्यूं लीजे ॥ 
ज्यां जिम्या जिग मांह, संख जब प्रगड वागो । 
च्यार वरण आश्रम, भरम सारो को भागो ॥ 
कुल को कारण नाहीं, नांव की महिमा भारी। 
भारत में कहयो ब्यास, गीता में किशन मुरारी ॥ 
औ नरपत के स्वाल, वचन अत बोले गाडा । 
हाथ जोड़ आधीन, दीन होय आपै ठाडा ॥

दोहा

संत प्रगट दरियावजी मुरधर देश दयाल । 
तां दरसण न्रप उधरया बखतसिंघ व्रीजपाल।।

अथ महिमा को प्रसंग

अथ महिमा को प्रसंग

इस प्रसंग में पद्मदास कृत आचार्य श्री दरिया महाप्रभु की महिमा का वर्णन है।

जन दरिया भगवंत संत प्रगट अवतारी। 
परमानन्द परबुध, अगम की कथा उचारी ॥ 
गिरधर गोविन्द राम, राम राधो भज लीना । 
खेम द्वारका दास, राम भज कारज कीना ॥ 
हरिदास हर भगत, राम ही राम उचारया ।
 रामदास ध्रुराम, राम कहे कारज सारया ॥ 
 तीन पुत्र सीष सात, प्रेम के परगट भारी ।
  तां मध जन दरियाव, बड़ा दीरग इदकारी ॥
   ग्यान ध्यान भरपूर, नूर निरमल सुखदाई। 
   भगत तेज परताप, सुंन समाद लगाई ॥ 
   प्रेमदास परताप, ईस्या परगट जुग सारे । 
   अनंत उधारया जीव, फेर अनंता कुं तारे ॥ 
   असो नाम परताप, दास द्ररिया के भारी। 
   ब्राह्मणछत्री वंस, सुद्र चेला ईदकारी ॥ 
   पूरणदास किसनो बड भागी । 
   सुखराम नानग, सुरत साहिब सुं लागी ॥ 
   भगत करी परवेस, देस मुरधर खंड माहि । 
   च्यारुं सिखां सुजाण, परगट घट व्यापक साही ॥

अथ सरूपचंदजी को प्रसंग


अथ सरूपचंदजी को प्रसंग

इस प्रसंग में इडवा निवासी स्वरूपचन्द जी सुराना (ओसवाल) द्वारा आचार्य श्री दरियाव जी महाप्रभु का दर्शन हेतु रामधाम रेण की ओर गमन करना मार्ग में ग्वाला से गुरुमोक्ष समाचार सुनकर आचार्य श्री वियोग से दुःखी होकर प्राण त्यागना ।

सरूपचंद महाजन, जात सुराणो प्रगट । 
नगर इड़वा माहीं, प्रेम भगता जन गगड़ ||
एक दिन उपज्यो भाव, प्रीत सतगुर सुं लागी । 
होय घोड़े असवार, चल्यो दरसण बड भागी ॥
दोय कोस उनमान, रेण को कांकड़ आयो । 
सांमो मिल्यो ग्वाल, जाण तांको बतलायो ॥
कोहो गुवाल मम साच, बात एक पूछू तौने ।
 जन दरिया का कुसल, प्रसण होय कैजे मोने ।। 
 कहयो गवाल मुख सवाल, हाल मोड़ा क्यूं आया।
  जन दरिया महाराज, आप तो धाम सिधाया ॥ 
  सुण्यो सरवण सबद, देह हंकारे छुटी। 
  पींगला जैसी प्रीत, प्रेम की गागर फूटी ॥ 
  आण मिल्यो संजोग, पुन पूरबलो भारी । 
  मनसा वाचा साच, मिल्या जन देव मुरारी ॥ 
  जन दरिया परताप, परम गत जैसे पाई । 
  सदा काल आनन्द, रहै चरणां के मांई ॥

साखी

पदमा जन दरियाव जी, कलुकाल भगवन्त । 
अवतारां ज्यूं अवद है, मोख गिरामी सन्त ॥ 
मोख मुगत पर लोक में, जाहां निरंजण राम । 
पदमा जन दरियावजी, पूथा केवल धाम ॥ 
केवल मिल केवल हुआ, अन्तर रही न रेख। 
पदमा जन दरियावजी, मिलगा ब्रह्म अलेख ॥ 
एक मेल हिलमिल हुवा, ज्यूं पाणी में लुण। 
पदमा जन दरियावजी, धरे न दूजी जूण ॥
आहा कही गुरदेवजी, सब सन्तन की साख । 
भागवत गीता कहयो, वेद पुराणां के वाख ॥ 
अनंत जीव तिरसी घणा, सत संगत सुख लेह । 
पदमा नाम परतापते, धरे न दूजी देह ॥
 राम मन्त्र है पदम दास, तीहुं लोक सिरताज।
  गिर परबत जल पर तिरया, पसू जूठा गजराज ॥ 
  पसु पंखेरू भूत गत, म्हा क्रम कुल नीच । 
  पदमा नांव परताप ते, तिरग्या बन्दर रीछ ।।
  लीला जन दरियाव की, सुणो सकल घट पूर । 
  सुख संपत नो निधि रहे, आठ सिध हजूर ।।
  लीला जन दरियाव की, पढ सुण करे विचार । 
  ग्यान भगत उर में उदे, भोजल उतरे पार ॥ 
  मो मन सारुं मैं कही, सतगुर के उपगार । 
  जनम जनम का दुःख मिट्या, दरिया के उपकार ॥ 
  पदमा जन दरियाव की, म्हैमा कही न जाय ।
   मो मुख महिमा का कहुं, म्हमा अथंक अथाय ॥ 
   पदमदास महमा कही, जन मोती परताप ।
   तां सुणिया सुख उपजे, कटे जनम जनम के पाप ॥ 
   सिख तो जन दरियाव का, जन मोती महाराज। 
   पदमदास सिर तपे, सरव सुंधारण काज।।
   
दोहा

समत अठारे से इकंतरो, चेत मास सुद जाण।
 तिथ पून्यू गुरवार दिन, हुई लीला परवाण ।।
गुर हरजन कृपा करी, कह्यो लीला ग्रन्थ विचार । 
नर नारी श्रवण करो, उपजे सुख अपार ।। 
आ पदमा की बिनती सुनो सन्त जगदीश । 
घटत बधत मम वचन है, गुना करो बगसीस ॥ 
पदमो बालक आपको, मात पिता गुर राम । 
भुलै चुके ओलबो, माफ करो घण साम ॥
म्हैमा सिध अघाध है, आवे नाहीं अन्त ।
में लघु चिड़कली, पीवे अणी चांच भरत ॥

Wednesday, 12 October 2022

अथ भेरु को प्रसंग

अथ भेरु को प्रसंग 

इस प्रसंग में एक बार आचार्य महाप्रभु का मेड़ता सिटी से रामधाम रेण पधारना अंधेरी रात को देखकर भेरु द्वारा हाथ में मुसाल (प्रकाश) लेकर आचार्य श्री दरियावजी महाराज की सेवा करना भेरु की प्रार्थना से आचार्य श्री द्वारा भेरु को शिष्यत्व प्रदान करना।

एक समे दरियाव, मेड़ते आप पधारया।
 करी घरां दिस गमन, चरण अवनी पर धारयो ।।
 असत भयों जब भाण, रेण जब पड़ी अंधारी । 
 भेरु मिल्यो भोपाल, काल का सुन इदकारी ॥ 
 निमसकार कर जोड़, दोड़ परदिखणा दीनी । 
 लीनी हाथ मुसाल, टेल संतन की कीनीं ॥ 
 कहयो दास दरियाव, सुणो भेरुं भोपाला। 
 किण विध उपजी प्रीत, रित तैं राखी काला ॥ 
 कह भेरु भोपाल, भगत को दरसण पाउं । 
 संत शिरोमण आप, ताहि कूँ मैं पूछाउं ॥ 
 जोजन एक परवांण, संत को घर पुगाया। 
 सब भूता दिस साथ, टेहल में सारा आया ॥ 
 असो नाम परताप, बंदगी भेरुं कीनी। 
 जन दरिया म्हाराज, ताय को दिक्ष्या दीनी ॥ 
 क्रिपा करी म्हाराज, कथा अद्भुत उचारी। 
 भजन तेज परताप, पड़यो भेरु पर भारी ॥

अथ जाट को प्रसंग

अथ जाट को प्रसंग

इस प्रसंग में आचार्य श्री दरियावजी महाप्रभु के शिष्य मनसाराम मोदाणी का निमन्त्रण देना अति प्रेम के कारण भूल में तीनों भाइयों द्वारा आचार्य महाप्रभु की सेवा नहीं करना प्रसन्नचित्त आचार्य महाप्रभु का सांजु ग्राम से रेण लौटना मार्ग में एक जाट भक्त की भक्ति के अत्याग्रह से आचार्य श्री द्वारा बाजरा के दाने (पूंख) का जीमना व रेण पधार जाना। पता लगने पर मोदाणी का जाट के पास जाकर बाजरा दाने पुण्य के भागीदार बनने के लिए जाट को पैसा देने का आग्रह करना, पर जाट का कुछ भी नहीं लेना, फलस्वरूप उसी जाट का दूसरे जन्म में नागौर नगर में हरखारामजी के शिष्य रामकरण नाम से जन्म लेना ।

जन दरिया महाराज, आप सांजु में आया। 
निमसकार कर जोड़, जाट जब सीस नवाया ॥ 
भाव प्रेम रस रीत, प्रीत कर फूंक जीमाया।
 जन दरिया महाराज, आप तंदुल ज्युं पाया ॥ 
 प्रसन्न भया महाराज, सभा में गिरा उचारी। 
 नफो लीयो हे जाट, बंदगी कीनी भारी॥ 
 मोदाण्यां सुण बात, कहयो अब कैसे कीजे । 
 मन माग्या सो दाम, चाल फेर उनको दीजे ॥ 
 रिप्या दाम सो लेर गया, जब तीन भाई। 
 कही जाट ने बात, दाय उनके नहीं आई।
म्हारे तो परताप, दास दरिया को भारी । 
मनसा भोजन मिले, राबड़या दूध त्यारी ॥

दोहा

फूंकां का परसाद ते, भई बात इदकार। 
बदयो भाग उस जाट को, बड़ जितनो विस्तार ॥