गुरु आये घन गरज कर, शब्द किया प्रकाश ।
बीज पड़ा था भूमि में, भई फूल फल आस ॥
शब्दार्थ
- गुरु आये → सतगुरु का प्रकट होना, शिष्य के जीवन में आगमन।
- घन गरज कर → मेघ की गड़गड़ाहट की तरह सशक्त वाणी से।
- शब्द किया प्रकाश → नाम-शब्द का प्रकाश किया, शब्दज्ञान दिया।
- बीज पड़ा था भूमि में → आत्मा रूपी बीज, जो अज्ञान की मिट्टी में पड़ा हुआ था।
- भई फूल फल आस → बीज अंकुरित होकर फूल-फल की आशा बनी; आत्मिक जीवन में विकास और फल प्राप्ति की संभावना बनी।
भावार्थ
महाराजश्री कहते हैं कि जब सच्चे सतगुरु की कृपा से नाम-शब्द का प्रकाश हृदय में प्रकट होता है, तब आत्मा रूपी बीज अंकुरित होकर आगे फल-फूल देने लगता है। जिस प्रकार बिना सूर्य और जल के बीज निष्क्रिय पड़ा रहता है, वैसे ही गुरु-कृपा के बिना आत्मा सुप्त अवस्था में रहती है। गुरु-वाणी (शब्द) ही वह ज्योति है जो भीतर चेतना का द्वार खोल देती है और आत्मा में ईश्वर दर्शन की आशा जाग्रत होती है।
व्याख्या
इस दोहे में आत्मिक जीवन की उन्नति को बीज, फूल और फल के प्रतीक द्वारा समझाया गया है।
- जब तक बीज मिट्टी में दबा रहता है, उसमें जीवन की संभावना तो होती है पर प्रकट नहीं होती। उसी प्रकार आत्मा में अनंत शक्ति छिपी होती है, पर अज्ञान के कारण वह सुप्त पड़ी रहती है।
- गुरु के "घन गरज कर" उपदेश और शब्द-प्रकाश से बीज अंकुरित होता है। यहाँ "शब्द" का अर्थ है—राम नाम, सुरति-शब्द-योग और गुरु वाणी।
- जैसे वर्षा के बाद धरती से अंकुर फूटते हैं, वैसे ही गुरु-प्रेरणा से साधक के भीतर ईश्वर-स्मरण का अंकुर फूटता है।
- "भई फूल फल आस" का आशय है कि गुरु-कृपा से साधक का जीवन फूलों-सा सुगंधित और फलों-सा मधुर हो जाता है, और परमात्मा-साक्षात्कार की आशा जागती है।
व्यवहारिक टिप्पणी
हम सबके भीतर आध्यात्मिक बीज मौजूद है, लेकिन वह निष्क्रिय पड़ा रहता है। जब सच्चे गुरु की वाणी और नाम-शब्द का प्रकाश मिलता है, तभी यह बीज अंकुरित होकर साधना, भक्ति और ज्ञान की ओर बढ़ता है।
- फूल = भक्ति, प्रेम और आनंद।
- फल = आत्म-साक्षात्कार और मुक्ति।
इसलिए यह दोहा हमें याद दिलाता है कि गुरु की वाणी को गंभीरता से सुनना और जीवन में उतारना ही हमारे भीतर के बीज को पल्लवित करने का उपाय है।
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